शास्त्रों में बताए गए पतन के आध्यात्मिक कारण
सनातन शास्त्रों में पतन को कभी केवल बाहरी असफलता या दुर्भाग्य नहीं माना गया। यहाँ पतन का अर्थ है—चेतना का नीचे गिरना। धन का नष्ट होना, राज्य का छिन जाना या प्रतिष्ठा का खो जाना पतन नहीं है; ये तो केवल उसके लक्षण हैं। वास्तविक पतन तब होता है, जब मनुष्य भीतर से अपने विवेक, संतुलन और सत्य से दूर हो जाता है। शास्त्र इसीलिए पतन के कारणों को राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक बताते हैं—क्योंकि बाहर जो घटता है, वह भीतर की स्थिति का ही प्रतिबिंब होता है।
शास्त्रों में पतन का पहला और मूल कारण बताया गया है—अहंकार। जब मनुष्य अपने सामर्थ्य, ज्ञान या पद को ही अपनी पहचान मान लेता है, तब अहंकार जन्म लेता है। अहंकार विवेक को ढक देता है। व्यक्ति सलाह को अपमान समझने लगता है, सुधार को शत्रुता और चेतावनी को ईर्ष्या। महाभारत में दुर्योधन का पतन इसलिए नहीं हुआ कि वह कमजोर था, बल्कि इसलिए हुआ कि वह सुनने में असमर्थ हो गया था। शास्त्र कहते हैं—जिस दिन मनुष्य ने सीखना बंद कर दिया, उसी दिन उसका पतन आरंभ हो गया।
दूसरा कारण है—विवेक का क्षय। विवेक वह शक्ति है, जो सही और गलत, धर्म और अधर्म में अंतर कराती है। जब मनुष्य तात्कालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक परिणामों को अनदेखा करने लगता है, तब विवेक दुर्बल हो जाता है। शास्त्र इसे राजस और तामस बुद्धि की अवस्था कहते हैं। ऐसे में व्यक्ति निर्णय तो लेता है, पर दिशा खो देता है। बाहर से वह आगे बढ़ता दिखाई देता है, पर भीतर से नीचे उतर रहा होता है।
तीसरा आध्यात्मिक कारण है—आसक्ति। शास्त्रों में कहा गया है कि आसक्ति ही बंधन है। जब मनुष्य व्यक्ति, पद, धन या विचार से इतना चिपक जाता है कि सत्य देखने की क्षमता खो देता है, तब पतन अनिवार्य हो जाता है। आसक्ति मनुष्य को निष्पक्ष नहीं रहने देती। वह अन्याय को भी सही ठहराने लगता है, यदि उससे उसकी आसक्ति सुरक्षित रहती हो। यही कारण है कि शास्त्र वैराग्य को त्याग नहीं, बल्कि दृष्टि की स्वतंत्रता मानते हैं।
चौथा कारण है—धर्म का विकृतिकरण। जब धर्म को साधना न रहकर उपयोग की वस्तु बना लिया जाता है, तब पतन तीव्र हो जाता है। शास्त्र कहते हैं कि अधर्म सबसे खतरनाक तब होता है, जब वह धर्म का मुखौटा पहन ले। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ, हिंसा या छल को धर्म का नाम देने लगता है, तब वह केवल स्वयं नहीं गिरता—वह समाज को भी नीचे खींच लेता है। यही कारण है कि धर्मग्रंथ बार-बार चेतावनी देते हैं कि धर्म को सत्ता और अहंकार से दूर रखा जाए।
पाँचवाँ कारण है—कृतज्ञता का लोप। शास्त्रों में कृतज्ञता को आध्यात्मिक शक्ति माना गया है। जो व्यक्ति यह भूल जाता है कि उसका जीवन, ज्ञान और अवसर उसे अकेले नहीं मिले, वह धीरे-धीरे कठोर और असंवेदनशील हो जाता है। कृतघ्न व्यक्ति देना भूल जाता है, और जो देना भूल गया, उसका पतन निश्चित माना गया है—क्योंकि जीवन प्रवाह है, संग्रह नहीं।
छठा कारण है—गुरु-तत्त्व का अपमान या अभाव। गुरु केवल व्यक्ति नहीं, वह विवेक और दिशा का प्रतीक है। जब मनुष्य यह मान लेता है कि उसे किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं, तब वह अपने ही दृष्टिकोण का कैदी बन जाता है। शास्त्रों में अनेक उदाहरण हैं जहाँ शक्ति, विद्या और तप—तीनों होते हुए भी पतन हुआ, क्योंकि गुरु-वाणी को अनदेखा किया गया। गुरु के बिना साधना भी भटक सकती है; शक्ति भी विनाश बन सकती है।
सातवाँ और अत्यंत सूक्ष्म कारण है—आत्म-विस्मृति। जब मनुष्य यह भूल जाता है कि वह केवल उपभोक्ता, प्रतियोगी या विजेता नहीं, बल्कि एक उत्तरदायी चेतना है, तब उसका जीवन दिशा खो देता है। यह आत्म-विस्मृति ही सभी पतनों की जड़ है। उपनिषद इसी को अज्ञान कहते हैं। अज्ञान से कर्म विकृत होते हैं, और विकृत कर्म अंततः पतन में बदल जाते हैं।
इन सभी कारणों का सुंदर समन्वय हमें भगवद्गीता में मिलता है। गीता स्पष्ट कहती है कि पतन किसी एक कर्म से नहीं होता, वह अवस्था से होता है। जब सत्त्व क्षीण होता है और रजस-तमस हावी हो जाते हैं, तब पतन स्वाभाविक हो जाता है। और यही कारण है कि गीता पतन से बचने का मार्ग भी बताती है—विवेक, वैराग्य और कर्मयोग। शास्त्रों की दृष्टि में पतन कोई दैवी दंड नहीं है। वह एक चेतावनी है—कि कहीं न कहीं हम अपने भीतर के धर्म से दूर हो रहे हैं।
अंततः सनातन शास्त्र यह सिखाते हैं कि पतन बाहर से नहीं आता—वह भीतर से शुरू होता है। और उसी तरह उत्थान भी बाहर से नहीं आता—वह भीतर के जागरण से जन्म लेता है। अहंकार छोड़ो, विवेक जगाओ, आसक्ति ढीली करो, धर्म शुद्ध रखो। क्योंकि शास्त्रों के अनुसार— जिस दिन मनुष्य भीतर से सीधा हो जाता है, उसी दिन उसका पतन रुक जाता है, और उत्थान अपने आप आरंभ हो जाता है।
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