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सनातन ग्रंथों में मन की शुद्धि के उपाय

सनातन ग्रंथों में मन की शुद्धि के उपाय

सनातन ग्रंथों में मन की शुद्धि के उपाय

Purification of Mind in Sanatan Shastras

सनातन ग्रंथों में मन को मानव जीवन का केंद्र माना गया है। शरीर कर्म करता है, वाणी अभिव्यक्ति देती है, पर दिशा मन से निकलती है। यदि मन शुद्ध है तो साधारण कर्म भी पुण्य बन जाते हैं, और यदि मन विकृत है तो महान कर्म भी कलुषित हो सकते हैं। इसीलिए शास्त्रों ने बाहरी आडंबर से अधिक मन की शुद्धि पर बल दिया है। मन की शुद्धि का अर्थ केवल बुरे विचारों को दबाना नहीं, बल्कि मन को स्थिर, संतुलित और प्रकाशमय बनाना है।

सबसे पहला उपाय बताया गया है—सत्संग। शास्त्र कहते हैं कि मन उसी रंग में रंगता है, जिस संग में रहता है। यदि संग नकारात्मक है, तो मन भी धीरे-धीरे वैसा ही हो जाता है। यदि संग ज्ञान, शांति और सदाचार का है, तो मन स्वतः परिष्कृत होने लगता है। सत्संग का अर्थ केवल किसी सभा में बैठना नहीं, बल्कि ऐसी पुस्तकों, विचारों और व्यक्तियों के साथ समय बिताना है, जो विवेक को जाग्रत करें।

दूसरा उपाय है—स्वाध्याय। स्वाध्याय का अर्थ केवल पढ़ना नहीं, बल्कि पढ़े हुए पर मनन करना है। भगवद्गीता और उपनिषद बार-बार कहते हैं कि ज्ञान को केवल सुनना पर्याप्त नहीं; उसे भीतर उतारना आवश्यक है। स्वाध्याय मन को ऊँचा विषय देता है, जिससे वह तुच्छ आकर्षणों से धीरे-धीरे दूर होने लगता है।

तीसरा उपाय है—जप और नाम-स्मरण। शास्त्रों में ध्वनि को अत्यंत सूक्ष्म शक्ति माना गया है। जब कोई व्यक्ति मंत्र-जप करता है, तो वह अपने मन की गति को एक बिंदु पर लाता है। चौथा उपाय है—निष्काम कर्म। मन की अशुद्धि का एक बड़ा कारण है फल की तीव्र इच्छा। शास्त्र सिखाते हैं कि कर्म करो, पर फल की आसक्ति छोड़ दो। जब मन परिणाम के बोझ से मुक्त होता है, तब वह हल्का हो जाता है।

पाँचवाँ उपाय है—ध्यान और मौन। सनातन परंपरा में मौन को मन की धुलाई कहा गया है। ध्यान मन को स्थिर करता है, और स्थिर मन में विकार टिकते नहीं। छठा उपाय है—सत्य और अहिंसा का अभ्यास। यदि व्यक्ति सत्य बोलता है, करुणा रखता है और दूसरों को पीड़ा देने से बचता है, तो उसका मन धीरे-धीरे सरल हो जाता है। छल, झूठ और हिंसा मन को भारी बना देते हैं।

सातवाँ उपाय है—कृतज्ञता और दान। जब मन केवल लेने की आदत में रहता है, तब वह असंतुष्ट हो जाता है। पर जब व्यक्ति देना सीखता है, तो उसके भीतर संतोष जन्म लेता है। संतोष मन की सबसे बड़ी शुद्धि है। शास्त्र कहते हैं कि जो कृतज्ञ है, उसका मन ईर्ष्या और द्वेष से दूर रहता है। इन सभी उपायों का सार यही है कि मन को दबाना नहीं, दिशा देना है।

अंततः मन की शुद्धि कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं है। यह निरंतर अभ्यास है—जैसे नदी बहते-बहते स्वयं को स्वच्छ रखती है। सनातन संदेश सरल है— मन को जीतना युद्ध नहीं, साधना है। मन को दबाना नहीं, प्रकाश देना है। जहाँ मन शुद्ध होता है, वहीं विचार शुद्ध होते हैं, वहीं कर्म शुद्ध होते हैं, और वहीं जीवन स्वतः धर्ममय हो जाता है।

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