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बृहस्पति और धर्म: समाज को दिशा देने वाला ग्रह

बृहस्पति और धर्म: समाज को दिशा देने वाला ग्रह

बृहस्पति और धर्म: समाज को दिशा देने वाला ग्रह

Jupiter and Dharma Social Direction

सनातन परंपरा में जब धर्म की बात होती है, तो वह केवल पूजा-पाठ या नियमों का समूह नहीं होता। धर्म का अर्थ है—जो समाज को धारण करे, जो व्यक्ति को भीतर से सही दिशा दे। इसी धर्मबुद्धि का अधिष्ठाता माना गया है देवगुरु बृहस्पति। बृहस्पति को ग्रह इसलिए नहीं कहा गया कि वह केवल आकाश में स्थित है, बल्कि इसलिए कि उसका तत्त्व मनुष्य और समाज—दोनों की चेतना में कार्य करता है। जहाँ बृहस्पति का प्रभाव सशक्त होता है, वहाँ समाज केवल शक्तिशाली नहीं, संतुलित भी होता है।

बृहस्पति का मूल स्वभाव है—विवेक। विवेक वह क्षमता है, जो सही और गलत में भेद कर सके, तात्कालिक लाभ और दीर्घकालिक कल्याण में अंतर समझ सके। सनातन दृष्टि में धर्म का पहला लक्षण यही है। धर्म क्रोध से नहीं चलता, धर्म चतुराई से नहीं चलता—धर्म विवेक से चलता है। और विवेक का प्रतीक बृहस्पति हैं। इसलिए उन्हें देवताओं का गुरु कहा गया। देवताओं के पास शक्ति थी, पर दिशा गुरु से मिलती थी। यह संकेत है कि समाज में शक्ति तभी कल्याणकारी होती है, जब वह धर्म के नियंत्रण में हो।

ज्योतिषीय प्रतीक के रूप में बृहस्पति को विस्तार का ग्रह कहा गया है। पर यह विस्तार केवल धन या पद का नहीं है—यह दृष्टि का विस्तार है। संकीर्ण दृष्टि से समाज टूटता है, व्यापक दृष्टि से समाज जुड़ता है। बृहस्पति-तत्त्व व्यक्ति को “मैं” से “हम” की ओर ले जाता है। यही धर्म का सामाजिक रूप है। जब व्यक्ति अपने लाभ के साथ-साथ समाज के परिणाम भी देखने लगता है, तब धर्म जीवित होता है। यही कारण है कि जिन कालों में समाज में गुरु, आचार्य और नीति-दर्शक सक्रिय रहे, वे काल संतुलित रहे।

शास्त्रों में बार-बार यह दिखाया गया है कि जब बृहस्पति की सलाह को अनदेखा किया गया, तब देवताओं को भी पराजय का सामना करना पड़ा। इसका अर्थ यह नहीं कि बृहस्पति किसी युद्धनीति के विशेषज्ञ थे, बल्कि यह कि वे धर्म-नीति के ज्ञाता थे। वे बताते थे कि कब युद्ध भी अधर्म हो जाता है, और कब शांति भी कायरता नहीं होती। यही सूक्ष्म विवेक समाज को विनाश से बचाता है। जहाँ यह विवेक नहीं रहता, वहाँ शक्ति अंधी हो जाती है—और अंधी शक्ति ही समाज का सबसे बड़ा संकट बनती है।

बृहस्पति और धर्म का संबंध शिक्षा से भी गहराई से जुड़ा है। सनातन परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल कुशल मनुष्य बनाना नहीं था, बल्कि उत्तरदायी मनुष्य बनाना था। बृहस्पति इसी उत्तरदायित्व-बोध के प्रतीक हैं। वे सिखाते हैं कि ज्ञान यदि करुणा से न जुड़ा हो, तो वह अहंकार बन जाता है; और अहंकार से जन्मा ज्ञान समाज को तोड़ देता है। इसलिए बृहस्पति-तत्त्व का मूल संदेश है—ज्ञान + करुणा = धर्म।

समाज में जब बृहस्पति-तत्त्व कमजोर पड़ता है, तब कुछ स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं—नियम तो बहुत होते हैं, पर न्याय नहीं होता; शिक्षा तो होती है, पर संस्कार नहीं होते; विकास तो होता है, पर संतोष नहीं होता। यह स्थिति बताती है कि समाज चतुर तो हो गया है, पर विवेकी नहीं रहा। सनातन दृष्टि में यही अधर्म की शुरुआत है। अधर्म का अर्थ अराजकता नहीं, दिशाहीन व्यवस्था है। और इस दिशाहीनता को ठीक करने वाला तत्त्व बृहस्पति है।

गुरुवार का दिन, गुरु-स्मरण, दान, अध्ययन और वाणी-संयम—ये सभी बृहस्पति से जुड़े संस्कार हैं। इनका उद्देश्य ग्रह को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर गुरु-भाव को जाग्रत करना है। जब समाज में लोग सुनना जानते हैं, सीखना जानते हैं और सलाह को सम्मान देते हैं, तब समाज अपने आप संतुलित हो जाता है। बृहस्पति यही सिखाते हैं—कि हर व्यक्ति नेता नहीं, पर हर व्यक्ति शिष्य अवश्य बना रहे।

आधुनिक युग में, जहाँ त्वरित सफलता, त्वरित निर्णय और त्वरित प्रतिक्रिया का बोलबाला है, बृहस्पति का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। वे धीमे निर्णय के पक्षधर हैं—ऐसे निर्णय जो आज भले कठिन लगें, पर कल समाज को स्थिर रखें। धर्म भी ऐसा ही है। वह तात्कालिक लोकप्रियता नहीं देता, पर दीर्घकालिक शांति देता है। इसलिए कहा गया कि धर्म का मार्ग कठिन होता है, पर वही समाज को टिकाऊ बनाता है।

अंततः, बृहस्पति और धर्म का संबंध किसी ग्रह-गणना तक सीमित नहीं है। यह संबंध मनुष्य की चेतना से जुड़ा है। जब व्यक्ति अपने जीवन में गुरु को स्थान देता है—चाहे वह व्यक्ति के रूप में हो या विवेक के रूप में—तभी उसका जीवन धर्ममय होता है। और जब समाज सामूहिक रूप से गुरु-तत्त्व को सम्मान देता है, तभी वह समाज दिशा पाता है। बृहस्पति इसलिए समाज को दिशा देने वाला ग्रह कहा गया— क्योंकि वह शक्ति को रोकता नहीं, उसे सही दिशा देता है। वह प्रश्नों को दबाता नहीं, उन्हें धर्म के प्रकाश में स्पष्ट करता है। जहाँ बृहस्पति-तत्त्व जीवित है, वहाँ समाज केवल आगे नहीं बढ़ता— वह सही दिशा में आगे बढ़ता है।

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