गुरु के बिना साधना क्यों अधूरी मानी गई
सनातन धर्म में साधना को कभी अकेले किए जाने वाला प्रयास नहीं माना गया। यहाँ साधना का अर्थ केवल मंत्र-जप, व्रत या ध्यान नहीं है, बल्कि चेतना का क्रमिक परिष्कार है। और इस परिष्कार की यात्रा को शास्त्रों ने अत्यंत सूक्ष्म, गहन और कभी-कभी भ्रमपूर्ण बताया है। इसी कारण शास्त्रों ने स्पष्ट कहा—गुरु के बिना साधना अधूरी ही नहीं, कई बार दिशाहीन भी हो जाती है। यह कथन किसी व्यक्ति-विशेष की महिमा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मनोविज्ञान की गहरी समझ पर आधारित है।
साधना भीतर की यात्रा है। बाहर की यात्रा में रास्ते दिखाई देते हैं, संकेत मिलते हैं, नक्शे काम आते हैं; पर भीतर की यात्रा में न रास्ते दिखते हैं, न संकेत स्पष्ट होते हैं। मन स्वयं ही साधक का सबसे बड़ा मित्र भी है और सबसे बड़ा शत्रु भी। जब साधक अकेला चलता है, तो वही मन उसे भ्रम, अहंकार और आत्म-प्रशंसा में फँसा सकता है। गुरु वही है जो साधक के मन के बाहर खड़ा होकर उसे उसके ही जाल दिखा सके। इसलिए कहा गया कि गुरु के बिना साधना स्व-निर्माण की जगह स्व-भ्रम भी बन सकती है।
उपनिषदों में गुरु को “द्रष्टा” कहा गया है—जो देख सकता है। शिष्य अपनी साधना में क्या अनुभव कर रहा है, वह उसे सत्य मान लेता है। पर गुरु जानता है कि कौन-सा अनुभव पड़ाव है और कौन-सा भ्रम। कौन-सी अवस्था आगे बढ़ने की है और कौन-सी वहीं रुक जाने की। साधना में सबसे बड़ा खतरा यही है कि साधक किसी बीच की अवस्था को अंतिम मान ले। गुरु का कार्य है—उसे आगे बढ़ाना, ठहरने नहीं देना। इसीलिए गुरु के बिना साधना को अधूरी कहा गया।
सनातन परंपरा में यह भी समझा गया कि साधना अहंकार को तोड़ने का मार्ग है। पर विडंबना यह है कि यदि गुरु न हो, तो साधना ही अहंकार को पोषित करने लगती है। “मैं ध्यान करता हूँ”, “मुझे अनुभव हुए”, “मैं दूसरों से आगे हूँ”—यह भाव साधना का सबसे सूक्ष्म पतन है। गुरु शिष्य को समय-समय पर झकझोरता है, उसकी प्रशंसा नहीं, उसकी शुद्धि करता है। शास्त्र कहते हैं—जहाँ साधना अहं बढ़ाए, वहाँ गुरु का अभाव है।
महाभारत का प्रसंग इस सत्य को अत्यंत स्पष्ट करता है। युद्धभूमि में खड़े अर्जुन के पास ज्ञान भी था, तप भी था, साधना भी थी—पर वह मोह में फँस गया। वहीं भगवान कृष्ण गुरु रूप में प्रकट हुए। कृष्ण ने अर्जुन की साधना नहीं बदली, उसके अस्त्र नहीं छीने, उसके कर्तव्य नहीं बदले—उन्होंने उसकी दृष्टि बदली। यही गुरु का कार्य है। साधना साधक करता है, पर दिशा गुरु देता है। दिशा के बिना साधना चल तो सकती है, पर पहुँच नहीं सकती।
शास्त्र यह भी कहते हैं कि गुरु साधना का भार हल्का करता है। अकेला साधक अपने हर अनुभव, हर शंका और हर भय को स्वयं ढोता है। गुरु के सान्निध्य में साधक निश्चिंत होता है। उसे पता होता है कि कोई है जो समझता है, जिसने यह मार्ग पहले तय किया है। यही निश्चिंतता साधना को गहरी बनाती है। भय में की गई साधना कठोर होती है; विश्वास में की गई साधना सहज होती है। गुरु उसी विश्वास का स्रोत है।
सनातन दृष्टि में गुरु कोई आदेश देने वाला नहीं है। सच्चा गुरु शिष्य को अपनी साधना स्वयं करने देता है। वह हस्तक्षेप कम करता है, पर आवश्यकता पर बिल्कुल सटीक करता है। यही कारण है कि शास्त्र कहते हैं—गुरु बिना साधना व्यर्थ है और साधना बिना गुरु अंधी है। दोनों का मिलन ही पूर्ण मार्ग बनाता है।
यह भी समझना आवश्यक है कि गुरु का अर्थ केवल बाहरी व्यक्ति नहीं है। प्रारंभ में गुरु बाहरी होता है, क्योंकि साधक भीतर सुनने योग्य नहीं होता। पर जैसे-जैसे साधना परिपक्व होती है, गुरु-तत्त्व भीतर जाग्रत होने लगता है—विवेक के रूप में। शास्त्रों के अनुसार सच्चा गुरु वही है, जो अंततः शिष्य को इस योग्य बना दे कि वह भीतर के गुरु को सुन सके। पर उस अवस्था तक पहुँचना बिना बाहरी गुरु के अत्यंत कठिन माना गया है।
सनातन धर्म इसीलिए कहता है कि गुरु के बिना साधना अधूरी है—क्योंकि साधना केवल अभ्यास नहीं, परिवर्तन है। और परिवर्तन के समय मार्गदर्शन आवश्यक होता है। जैसे बीज स्वयं वृक्ष नहीं बन जाता; मिट्टी, जल, सूर्य और माली—सबका योगदान होता है—वैसे ही साधक स्वयं प्रयास करता है, पर गुरु उस प्रयास को सही दिशा देता है।
आज के युग में, जहाँ व्यक्ति स्वयं को ही गुरु मानने लगा है, यह शिक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है। पुस्तकों, वीडियो और तकनीकों से साधना के तरीके मिल सकते हैं, पर दृष्टि नहीं मिलती। दृष्टि केवल उस से मिलती है, जिसने स्वयं अंधकार को पार किया हो। इसलिए शास्त्रों ने स्पष्ट कहा—गुरु कोई विलास नहीं, साधना की आवश्यकता है।
अंततः सनातन दृष्टि का संदेश सरल और करुणामय है— साधना चलने की शक्ति है, गुरु दिशा की स्पष्टता है। शक्ति बिना दिशा बिखर जाती है, और दिशा बिना शक्ति निष्फल रहती है। इसीलिए कहा गया— गुरु के बिना साधना अधूरी है, और साधना के बिना गुरु-ज्ञान भी अपूर्ण है।
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