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नंदनार की कथा: जब भक्ति ने तोड़ी सामाजिक बेड़ियाँ | सनातन संवाद

नंदनार की कथा: जब भक्ति ने तोड़ी सामाजिक बेड़ियाँ | सनातन संवाद

नंदनार की कथा

जब भक्ति ने सामाजिक बंधन तोड़ दिए

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाने आया हूँ जहाँ सामाजिक बंधन भक्ति के आगे टूट गए और जहाँ प्रभु ने स्वयं चलकर अपने भक्त की राह आसान की।

यह कथा है नंदनार की— एक ऐसे सेवक की, जिसके लिए मंदिर के द्वार नहीं खुले थे, पर हृदय का द्वार कभी बंद नहीं हुआ।

और यह कथा है भगवान शिव की करुणा की, जो मनुष्य की बनाई दीवारों को स्वीकार नहीं करती।

नंदनार का जीवन

बहुत प्राचीन समय में तमिल भूमि में नंदनार नाम का एक दास रहता था।

उसका जीवन पशुओं की सेवा, खेतों का श्रम और मौन भक्ति में बीतता था।

उसे वेदों का ज्ञान नहीं था, न पूजा-विधि का अभ्यास;

पर उसके भीतर एक आग जलती थी— चिदंबरम के नटराज के दर्शन की।

वह दूर से मंदिर के गोपुरम को देखता, धूल में लोटता, और आँखें भरकर लौट आता।

समाज की मर्यादाएँ उसके पैरों में बेड़ियाँ थीं, पर उसकी दृष्टि प्रभु पर टिकी रहती।

प्रतीक्षा और भक्ति

दिन बीतते गए। नंदनार का मन एक ही नाम में अटका रहा।

वह कहता— “आज नहीं तो कल, प्रभु बुलाएँगे।”

एक दिन उसके स्वामी ने उसे चिदंबरम जाने की अनुमति दी।

नंदनार की चाल तेज़ हुई, पर जैसे ही वह मंदिर के समीप पहुँचा,

उसके पथ में एक अडचन खड़ी हो गई—

वह वही सामाजिक सीमा थी जो सदियों से खड़ी थी।

नंदनार ठिठक गया। उसने मंदिर की ओर देखा, फिर धरती पर माथा रख दिया।

उसने कोई शिकायत नहीं की; केवल नाम लिया— “हे नटराज!”

शिव की करुणा

कथा कहती है कि उसी रात मंदिर में एक अद्भुत घटना घटी।

भगवान शिव स्वयं पुजारियों के स्वप्न में प्रकट हुए और कहा—

“मेरे भक्त को रोका गया है।”

प्रभु की आज्ञा हुई कि मार्ग प्रशस्त किया जाए।

प्रातःकाल जब नंदनार आया, तो मंदिर के द्वार खुले थे—

न केवल पत्थर के, बल्कि मन के भी।

नंदनार भीतर गया। नृत्य करते नटराज के सामने उसका हृदय भर आया।

उसने कुछ नहीं माँगा; उसने केवल स्वयं को सौंप दिया।

अग्नि और शुद्धि

कुछ परंपराओं में कहा जाता है कि नंदनार ने अग्नि में प्रवेश किया और वहीं से दिव्य रूप में बाहर आया।

यह अग्नि दंड नहीं, शुद्धि थी।

प्रभु ने उसे अपने निकट स्थान दिया, जहाँ भक्ति ही पहचान थी।

नंदनार की देह बदली या न बदली—

कथा का सार यह है कि उसकी स्थिति बदल गई।

वह दास नहीं रहा; वह भक्त बनकर प्रतिष्ठित हुआ।

कथा का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर के दरबार में प्रवेश के लिए जन्म-पत्र नहीं, हृदय-पत्र चाहिए।

जब भक्ति सच्ची हो, तो प्रभु स्वयं समाज की गाँठें खोलते हैं।

नंदनार ने दिखाया कि प्रतीक्षा भी साधना हो सकती है, और मौन भी प्रार्थना।

जहाँ मनुष्य रोक लगाता है, वहाँ ईश्वर मार्ग बना देते हैं।

स्रोत / संदर्भ

यह कथा शैव परंपरा के पेरियपुराणम् में नंदनार नयनार के चरित्र के रूप में वर्णित है;

चिदंबरम-नटराज परंपरा में इसके विविध रूप मिलते हैं।


लेखक : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन : सनातन संवाद

Copyright Disclaimer : यह कथा सनातन धर्म की प्रमाणिक शैव परंपरा पर आधारित है। बिना अनुमति पुनर्प्रकाशन वर्जित है।

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