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हिन्दू धर्म का इतिहास: शक्ति, स्त्री-तत्त्व और सृजन की मूल चेतना | सनातन संवाद

हिन्दू धर्म का इतिहास: शक्ति, स्त्री-तत्त्व और सृजन की मूल चेतना | सनातन संवाद
हिन्दू धर्म का इतिहास (क्रमशः)

शक्ति, स्त्री-तत्त्व और सृजन की मूल चेतना

हिन्दू धर्म के इतिहास को यदि किसी एक सूत्र में समझना हो, तो वह सूत्र शक्ति है। क्योंकि यहाँ सृजन केवल पुरुष तत्व से नहीं, बल्कि स्त्री-तत्त्व की सक्रिय उपस्थिति से होता है।

सनातन परंपरा में शक्ति कोई सहायक विचार नहीं, बल्कि मूल ऊर्जा है — जिसके बिना शिव भी शव माने गए।

यह दृष्टि अपने आप में उस काल के लिए असाधारण थी, जब विश्व की अधिकांश सभ्यताएँ स्त्री को या तो गौण मानती थीं या सीमित भूमिका में बाँध देती थीं।

प्रारंभिक इतिहास और मातृदेवी की अवधारणा

इतिहास की सबसे प्रारंभिक परतों में भी मातृदेवी के संकेत मिलते हैं।

धरती को माता कहा गया, नदी को जननी और प्रकृति को पालनकर्त्री।

यह केवल भावुक कल्पना नहीं थी, बल्कि अनुभव से उपजा सत्य था।

मनुष्य ने देखा कि जैसे स्त्री जीवन को जन्म देती है, वैसे ही धरती अन्न देती है, और नदी सभ्यता को जीवित रखती है।

यहीं से शक्ति का दर्शन जन्म लेता है — सृजन, पोषण और परिवर्तन की संयुक्त शक्ति।

देवी रूपों में शक्ति का विस्तार

समय के साथ यह तत्त्व देवी के रूप में स्पष्ट होता गया।

दुर्गा (संरक्षण)
सरस्वती (ज्ञान)
लक्ष्मी (समृद्धि)
काली (परिवर्तन)

ये अलग-अलग देवियाँ नहीं, बल्कि शक्ति की विभिन्न अवस्थाएँ हैं।

कहीं वह संरक्षण करती है, कहीं ज्ञान देती है, कहीं संहार करती है।

इतिहास की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाता है कि हिन्दू समाज ने स्त्री को केवल कोमलता से नहीं, बल्कि निर्णय और सामर्थ्य से भी जोड़ा।

संकट और उग्र शक्ति

जब समाज संकट में पड़ा, तब शक्ति उग्र रूप में प्रकट हुई।

महिषासुरमर्दिनी की कथा केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि यह संकेत है कि जब अन्य शक्तियाँ असफल हों, तब स्त्री-तत्त्व ही अंतिम समाधान बनता है।

यह विचार इतिहास में कई बार दोहराया गया — चाहे वह गृहस्थ जीवन हो, राजनैतिक संघर्ष हो या सांस्कृतिक संरक्षण।

साधना, तंत्र और आंतरिक शक्ति

शक्ति परंपरा ने साधना को भी नया मार्ग दिया।

यहाँ उपासना केवल पूजा नहीं, बल्कि अनुभव है।

तंत्र, मंत्र और ध्यान — ये सब शक्ति को बाहरी देवी नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना के रूप में पहचानने के साधन बने।

इस दृष्टि से देखें तो हिन्दू धर्म का इतिहास केवल आस्था का नहीं, बल्कि गहन मनोवैज्ञानिक समझ का भी इतिहास है।

लोक परंपरा और जीवित शक्ति

लोक परंपराओं में शक्ति और अधिक सजीव हो जाती है।

ग्रामदेवी, कुलदेवी, क्षेत्रपालिनी —

ये सब उस चेतना के स्थानीय रूप हैं, जो समाज को सुरक्षा और पहचान देती हैं।

मंदिर हो या खेत, पर्व हो या संकट — शक्ति हर जगह उपस्थित मानी गई।

इसीलिए हिन्दू धर्म कभी केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रहा; वह लोक की धड़कन में बसता रहा।

आधुनिक संदर्भ और सनातन दृष्टि

आधुनिक काल में जब स्त्री-शक्ति की चर्चा अधिकार और समानता तक सीमित कर दी जाती है,

तब सनातन परंपरा का यह इतिहास एक गहरा स्मरण कराता है कि यहाँ स्त्री को पहले ही सृष्टि का केंद्र माना गया था।

यह परंपरा किसी आंदोलन से नहीं, बल्कि अनुभूति से बनी थी।

निष्कर्ष

इस प्रकार हिन्दू धर्म का इतिहास हमें यह सिखाता है कि शक्ति को दबाया नहीं जाता, समझा जाता है।

और जब समझ लिया जाए, तब वही शक्ति धर्म, समाज और आत्मा — तीनों को संतुलन देती है।

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