सनातन दृष्टि में माता–पिता : जीवित देवता
सनातन धर्म की जड़ में जो सबसे कोमल, सबसे पवित्र और सबसे स्थायी सत्य है, वह है माता–पिता की महिमा। यहाँ माता–पिता को किसी प्रतीकात्मक सम्मान के कारण ऊँचा स्थान नहीं दिया गया, बल्कि इसलिए कि वही मनुष्य के जीवन का प्रथम आधार हैं। देवता दूर के लोकों में पूजित होते हैं, पर माता–पिता इसी धरती पर साक्षात् त्याग, तप और करुणा बनकर हमारे सामने खड़े रहते हैं। इसीलिए सनातन परंपरा में उन्हें देवताओं से भी पहले स्मरण किया गया।
सनातन कहता है—जिसने माता की ममता और पिता के परिश्रम को समझ लिया, उसने धर्म को समझ लिया। जो उनके ऋण को पहचान गया, वह मोक्ष के पथ पर अपने आप चल पड़ा।
वैदिक काल से ही यह बोध मनुष्य के संस्कारों में डाला गया। तैत्तिरीय उपनिषद का वाक्य “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव” केवल नैतिक शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन का दिशा–सूत्र है। गुरुकुल से विदा होते समय आचार्य शिष्य से यह नहीं कहते थे कि पहले मंदिर जाओ, बल्कि यह कहते थे कि पहले माता–पिता को देवता मानो। क्योंकि जिसने घर में देवत्व देख लिया, उसे बाहर देवता ढूँढने की आवश्यकता नहीं रहती।
सनातन शास्त्र माता की महिमा को विशेष रूप से रेखांकित करते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि जहाँ ज्ञान देने वाला आचार्य पूज्य है, वहाँ पिता उससे भी अधिक सम्माननीय है, और माता—उन सबसे भी ऊपर। कारण स्पष्ट है—माता केवल जन्म नहीं देती, वह अपने सुख, निद्रा, स्वास्थ्य और इच्छाओं का त्याग करके जीवन गढ़ती है। पिता मौन रहकर जीवन की कठोर धूप सहता है, ताकि संतान छाया में बढ़ सके।
पुराणों की कथाएँ इस सत्य को भाव के साथ समझाती हैं। रामायण में भगवान श्रीराम का जीवन इस बात का प्रमाण है कि पिता की आज्ञा केवल आदेश नहीं, धर्म होती है। राज्य, वैभव और अधिकार छोड़कर वन जाना—यह त्याग नहीं, पितृभक्ति की सर्वोच्च साधना थी। राम ने यह नहीं पूछा कि यह न्यायसंगत है या नहीं; उन्होंने केवल इतना जाना कि पिता का वचन ही मेरा धर्म है।
महाभारत में युधिष्ठिर का कथन और भी गहराई से इस भाव को प्रकट करता है—पिता ही स्वर्ग हैं, पिता ही धर्म हैं। जब पिता प्रसन्न होते हैं, तो देवताओं को अलग से मनाने की आवश्यकता नहीं रहती। यह सनातन की व्यावहारिक आध्यात्मिकता है—ईश्वर को जीवन से अलग नहीं किया गया, बल्कि जीवन में ही स्थापित कर दिया गया।
लोककथाओं में श्रवण कुमार माता–पिता की सेवा का जीवंत आदर्श हैं। वे तीर्थयात्रा नहीं कर रहे थे, वे माता–पिता को तीर्थ बना रहे थे। कंधों पर कांवड़ नहीं, धर्म उठाया हुआ था। वहीं ध्रुव की कथा बताती है कि माता का एक सही उपदेश संतान को अमर कर सकता है। सुनीति का मार्गदर्शन केवल सांत्वना नहीं था, वह आत्मबल था।
सनातन शास्त्र बताते हैं कि मनुष्य तीन ऋण लेकर जन्म लेता है—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इनमें पितृ ऋण सबसे निकट और सबसे संवेदनशील है। क्योंकि देवों ने रक्षा की, ऋषियों ने ज्ञान दिया, पर माता–पिता ने जीवन दिया। पद्म पुराण में कहा गया है कि माता–पिता की सेवा का फल समस्त तीर्थों के स्नान से भी अधिक है। उनके चरण ही वास्तविक तीर्थ हैं।
आज के समय में जब सुविधा बढ़ रही है, पर संवेदना घट रही है, तब यह शिक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है। वृद्धाश्रम केवल सामाजिक ढाँचा नहीं, संस्कारों के क्षरण का संकेत हैं। सनातन धर्म माता–पिता की सेवा को बोझ नहीं, सौभाग्य मानता है। यह सेवा उपकार नहीं, कर्तव्य भी नहीं—यह कृतज्ञता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।
सनातन का अंतिम संदेश बहुत सरल है—
माता–पिता की प्रसन्नता में ही जीवन की शांति छिपी है।
उनके आशीर्वाद में ही सफलता का बीज है।
और उनकी सेवा में ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों का समावेश है।
जो अपने माता–पिता के चरणों में नतमस्तक हो गया,
वह किसी और देवता से वंचित नहीं रहता।
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