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गुरुवार को पीले रंग का महत्व और उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव

गुरुवार को पीले रंग का महत्व और उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव

गुरुवार को पीले रंग का महत्व और उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव

Yellow Color Significance Thursday

सनातन परंपरा में रंग केवल दृश्य सौंदर्य नहीं हैं, वे चेतना के संकेत हैं। हर रंग मनुष्य के मन, भाव और निर्णयों पर प्रभाव डालता है। इसी परंपरा में गुरुवार का दिन और पीले रंग का संबंध केवल परंपरा या आस्था का विषय नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक अर्थों से जुड़ा हुआ है। गुरुवार को पीला पहनना, पीली वस्तुओं का दान करना या पीले रंग से जुड़ी साधना करना—ये सभी क्रियाएँ मनुष्य के भीतर ज्ञान, स्थिरता और सकारात्मकता को जागृत करने का प्रयास हैं।

गुरुवार का संबंध देवताओं के गुरु, अर्थात देवगुरु बृहस्पति से माना गया है। बृहस्पति केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, नीति और धर्म के प्रतीक हैं। जिस प्रकार गुरु शिष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है, उसी प्रकार गुरुवार का दिन मनुष्य को आंतरिक अनुशासन और स्पष्ट सोच की ओर प्रेरित करता है। पीला रंग इसी ज्ञान-तत्त्व का दृश्य रूप है। यह न तो उग्र है, न ही उदास—यह संतुलित, स्थिर और आश्वस्त करने वाला रंग है।

शास्त्रीय दृष्टि से देखें तो पीला रंग सत्त्व गुण से जुड़ा माना गया है। सत्त्व गुण का अर्थ है—प्रकाश, शुद्धता और संतुलन। जब मनुष्य सत्त्व में होता है, तब उसके निर्णय स्पष्ट होते हैं, भावनाएँ संयमित रहती हैं और अहंकार का प्रभाव कम होता है। गुरुवार को पीला रंग धारण करने का संकेत यही है कि इस दिन मनुष्य अपने भीतर सत्त्व को बढ़ाए, रज (अशांति) और तम (अज्ञान) को शांत करे। यह कोई बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि मन को प्रशिक्षित करने की विधि है।

मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि पीला रंग मानव मस्तिष्क पर विशेष प्रभाव डालता है। आधुनिक रंग-मनोविज्ञान के अनुसार पीला रंग आशावाद, स्पष्ट सोच और स्मरण शक्ति से जुड़ा हुआ है। यह मस्तिष्क के उस भाग को सक्रिय करता है जो सीखने, निर्णय लेने और समस्या सुलझाने से संबंधित होता है। यही कारण है कि कई शिक्षण संस्थानों, पुस्तकालयों और अध्ययन कक्षों में पीले रंग के हल्के स्वरूप का प्रयोग किया जाता है। जब व्यक्ति पीला रंग देखता है या धारण करता है, तो उसके भीतर एक प्रकार की मानसिक सतर्कता उत्पन्न होती है।

गुरुवार और पीले रंग का यह संबंध केवल व्यक्तिगत मनोविज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। गुरुवार को दान, सेवा और परामर्श का दिन माना गया है। पीला रंग उदारता और विस्तार का प्रतीक है। यह वह रंग है जो संकुचन नहीं, विस्तार का संकेत देता है। इसी कारण पीले वस्त्र, पीले अन्न या पीली मिठाई का दान करने की परंपरा बनी। यह दान केवल वस्तु का नहीं, भावना का भी होता है—ज्ञान बाँटने की, समय देने की और मार्गदर्शन करने की।

ज्योतिषीय दृष्टि से गुरुवार का संबंध बृहस्पति ग्रह से जोड़ा जाता है, जिसे आधुनिक खगोल विज्ञान में जुपिटर कहा जाता है। बृहस्पति ग्रह को विस्तार, वृद्धि और मार्गदर्शन का प्रतीक माना गया है। जिन व्यक्तियों के जीवन में यह ग्रह संतुलित माना जाता है, उनमें आशावाद, नैतिकता और दीर्घकालिक सोच अधिक पाई जाती है। पीला रंग इसी बृहस्पति-तत्त्व का प्रतीक है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सनातन परंपरा ग्रहों को भाग्य के कारक के रूप में नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और प्रवृत्तिगत संकेतों के रूप में देखती है।

गुरुवार को पीला रंग पहनने का एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह भी है कि यह व्यक्ति को धैर्य की ओर ले जाता है। पीला न तो उत्तेजना पैदा करता है, न ही उदासी—यह मन को स्थिर करता है। आज के समय में, जहाँ निर्णय जल्दबाज़ी में लिए जाते हैं और प्रतिक्रियाएँ त्वरित होती हैं, पीला रंग मन को ठहराव का संकेत देता है। यह ठहराव ही विवेक का जन्मस्थल है। और विवेक ही गुरु-तत्त्व का मूल है।

भारतीय जीवन-शैली में गुरुवार को विशेष रूप से अध्ययन, शास्त्र-पाठ, मंत्र-जप और गुरु-स्मरण का दिन माना गया। पीला रंग इन सभी क्रियाओं के अनुकूल वातावरण बनाता है। जब मनुष्य पीला पहनता है, तो उसका अवचेतन यह संकेत ग्रहण करता है कि यह दिन आत्म-विकास और ज्ञान का है। मनोविज्ञान में इसे “कलर एंकरिंग” कहा जा सकता है—जहाँ एक रंग किसी विशेष मानसिक अवस्था को सक्रिय कर देता है।

पीले रंग का एक और प्रभाव है—भय में कमी। यह रंग सुरक्षा और भरोसे की भावना देता है। यही कारण है कि बच्चों की पुस्तकों, शिक्षण सामग्री और प्रेरणात्मक प्रतीकों में पीले रंग का प्रयोग अधिक होता है। गुरुवार को पीला रंग अपनाने से व्यक्ति के भीतर भविष्य को लेकर एक सहज विश्वास उत्पन्न होता है। वह जीवन को केवल संघर्ष नहीं, सीख की प्रक्रिया के रूप में देखने लगता है।

सनातन दृष्टि में गुरु का कार्य भय दूर करना भी है—अज्ञान का भय, असफलता का भय और मृत्यु का भय। पीला रंग उसी निर्भयता का प्रतीक है। यह बताता है कि ज्ञान जहाँ है, वहाँ अंधकार टिक नहीं सकता। गुरुवार का दिन और पीला रंग मिलकर यही संदेश देते हैं कि जीवन की जटिलताओं का समाधान बल से नहीं, बोध से होता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि पीला रंग दिखावे का नहीं, सादगी का रंग है। यह स्वर्ण जैसा चमकता नहीं, पर सूर्य जैसा प्रकाश देता है। यही कारण है कि सन्यास, साधना और विद्या की परंपरा में पीले और केसरिया रंग को विशेष स्थान मिला। यह मनुष्य को बाहरी आडंबर से भीतर की स्पष्टता की ओर ले जाता है। गुरुवार का पीला रंग हमें स्मरण कराता है कि सच्चा विकास भीतर होता है।

आज के आधुनिक जीवन में, जहाँ रंगों का प्रयोग केवल फैशन तक सीमित हो गया है, गुरुवार और पीले रंग की परंपरा हमें रंगों के गहरे अर्थ से जोड़ती है। यह हमें सिखाती है कि हमारे चारों ओर का वातावरण हमारे मन को निरंतर प्रभावित करता है—और यदि हम सचेत रूप से सही प्रतीकों का चयन करें, तो जीवन अधिक संतुलित हो सकता है।

अंततः गुरुवार को पीले रंग का महत्व किसी अंधविश्वास में नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना को प्रशिक्षित करने की सनातन विधि में निहित है। यह रंग हमें ज्ञान की ओर झुकाता है, मन को स्थिर करता है और जीवन को व्यापक दृष्टि से देखने की प्रेरणा देता है। जब हम गुरुवार को पीला रंग धारण करते हैं, तो वास्तव में हम अपने भीतर के गुरु को स्मरण करते हैं—वह गुरु जो हमें अधैर्य से धैर्य की ओर, भ्रम से स्पष्टता की ओर और अज्ञान से बोध की ओर ले जाता है। यही पीले रंग का वास्तविक और शाश्वत प्रभाव है।

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