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रामेश्वरम में रावण कैसे बना शिवलिंग स्थापना का आचार्य? – रहस्य, कथा और आध्यात्मिक अर्थ

रामेश्वरम में रावण कैसे बना शिवलिंग स्थापना का आचार्य? – रहस्य, कथा और आध्यात्मिक अर्थ

सनातन परंपरा में रामेश्वरम का शिवलिंग अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि लंका विजय से पहले भगवान श्रीराम ने समुद्र तट पर भगवान शिव की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त किया था। कुछ दक्षिण भारतीय परंपराओं और तमिल ग्रंथ इरामावतारम् (कम्ब रामायण) से जुड़ी लोककथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि इस शिवलिंग स्थापना के अनुष्ठान में रावण ने आचार्य की भूमिका निभाई थी। हालांकि वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस जैसे मुख्य ग्रंथों में यह कथा विस्तार से नहीं मिलती, लेकिन लोक परंपराओं में इसे विशेष स्थान प्राप्त है।

कथा के अनुसार, जब श्रीराम समुद्र पर सेतु निर्माण के बाद शिवलिंग स्थापना करना चाहते थे, तब उन्हें एक ऐसे ब्राह्मण की आवश्यकता थी जो वेदों का ज्ञाता हो और शिव उपासना में निपुण हो। उस समय रावण को अत्यंत विद्वान, महा पंडित और महान शिव भक्त माना जाता था। रावण केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं बल्कि चारों वेदों का ज्ञाता, ज्योतिष और तंत्र विद्या का जानकार तथा शिव तांडव स्तोत्र का रचयिता माना जाता है। इसी कारण श्रीराम ने जामवंत को लंका भेजकर रावण को यज्ञ का आचार्य बनने का निमंत्रण भेजा।

जब जामवंत लंका पहुँचे, तब रावण ने उनका सम्मान किया। जब उसे पता चला कि श्रीराम स्वयं शिव पूजा के लिए उसे आचार्य बनाना चाहते हैं, तब उसने इसे अपने आराध्य भगवान शिव की सेवा का अवसर माना। कहा जाता है कि रावण ने यह निमंत्रण स्वीकार किया क्योंकि उसके लिए शिव पूजा सबसे बड़ा धर्म था, चाहे यजमान उसका शत्रु ही क्यों न हो। यह प्रसंग रावण के ज्ञान, धर्म पालन और आचार्य धर्म को दिखाता है।

जब रावण समुद्र तट पर पहुँचा, तब उसने वैदिक नियमों के अनुसार अनुष्ठान की तैयारी शुरू कराई। उसने पूछा कि यजमान की पत्नी कहाँ है, क्योंकि वैदिक परंपरा में पत्नी के बिना कई धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं माने जाते। तब कथा के अनुसार सीता जी को भी वहाँ लाया गया और उन्हें श्रीराम के साथ यज्ञ में बैठाया गया। यह प्रसंग वैदिक परंपराओं में गृहस्थ धर्म और पति-पत्नी की संयुक्त भागीदारी के महत्व को दर्शाता है।

कथा में आगे बताया जाता है कि शिवलिंग लाने के लिए हनुमान जी कैलाश गए थे, लेकिन शुभ मुहूर्त निकलने वाला था। तब आचार्य रावण ने समय की महत्ता समझते हुए सीता जी को समुद्र तट की रेत से शिवलिंग बनाने का निर्देश दिया। सीता जी ने अपने हाथों से बालू का शिवलिंग बनाया और उसी की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा की गई। इसी शिवलिंग को आगे चलकर रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग से जोड़ा जाता है।

जब अनुष्ठान पूरा हुआ और दक्षिणा देने का समय आया, तब रावण ने धन या संपत्ति नहीं मांगी। उसने केवल यह इच्छा जताई कि जब उसका अंतिम समय आए, तब श्रीराम उसके सामने उपस्थित रहें। कथा के अनुसार युद्ध के दौरान जब रावण मृत्यु शैया पर था, तब श्रीराम उसके पास गए और यह वचन पूरा किया। यह प्रसंग रघुकुल की वचन परंपरा और धर्म पालन को दर्शाता है।

यह कथा रावण के एक अलग पक्ष को दिखाती है। आमतौर पर रावण को केवल खलनायक के रूप में देखा जाता है, लेकिन सनातन परंपरा में उसे महान विद्वान, शिव भक्त और शक्तिशाली तपस्वी भी माना गया है। यह कथा यह भी सिखाती है कि धर्म और ज्ञान व्यक्ति के शत्रु-मित्र से ऊपर होते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह कथा बताती है कि भगवान शिव की भक्ति और धर्म पालन सर्वोच्च है। साथ ही यह भी दर्शाती है कि जीवन में ज्ञान, विनम्रता और धर्म का पालन व्यक्ति को महान बनाता है, चाहे उसका जीवन अंततः किस दिशा में जाए।

रामेश्वरम आज भी हिंदू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक माना जाता है। यहाँ स्थापित शिवलिंग को उत्तर और दक्षिण भारत की आध्यात्मिक एकता का प्रतीक भी माना जाता है।



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