सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्मरण: भूलने की बीमारी से मुक्ति और स्वयं की खोज | सनातन संवाद

स्मरण: भूलने की बीमारी से मुक्ति और स्वयं की खोज | सनातन संवाद

स्मरण

भूलने की बीमारी से मुक्ति
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस साधना की बात बताने आया हूँ
जो दिखती साधारण है,
पर जीवन को भीतर से सीधा कर देती है — स्मरण
सनातन कहता है —
मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या अज्ञान नहीं,
भूल जाना है।

वह भूल जाता है — वह कौन है, क्यों आया है, और किस दिशा में जाना है।

स्मरण का वास्तविक अर्थ

स्मरण का अर्थ मंत्र रटना नहीं है। स्मरण का अर्थ है — हर क्षण यह याद रखना कि मैं क्या हूँ और क्या नहीं।

जब क्रोध आता है, और तुम्हें याद रहता है — “यह क्षणिक है” — वही स्मरण है। जब लालच आता है, और तुम्हें याद रहता है — “सब यहीं रह जाएगा” — वही स्मरण है।

सनातन में स्मरण का स्थान

सनातन में नाम-स्मरण इसलिए दिया गया क्योंकि मन बार-बार भटकता है। नाम उसे घर लौटाता है। पर स्मरण केवल ईश्वर का नहीं, स्वयं का भी होता है।

जब तुम अपने मूल स्वभाव को याद रखते हो —
सत्य, करुणा, विवेक
तब बाहरी आकर्षण अपनी पकड़ खो देते हैं।

आधुनिक मनुष्य और विस्मृति

आज मनुष्य हर चीज़ याद रखता है — नंबर, पासवर्ड, तारीखें — पर अपने लक्ष्य को भूल गया है। स्मरण मन को वर्तमान में लाता है। और जो वर्तमान में है, वही सच में जीवित है।

ऋषि इसलिए कहते थे —
“स्मरण ही साधना है।”
क्योंकि जो याद रखा गया, वही जिया गया।

अंतिम सत्य

स्मरण कोई अतिरिक्त काम नहीं, यह भ्रम से जागने की आदत है। और जो जाग गया, उसे जगाने के लिए कोई शोर नहीं चाहिए।

© सनातन संवाद | लेखक: तु ना रिं 🔱

टिप्पणियाँ