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कुंती का अपराधबोध – जिसे उसने कभी पूरी तरह कहा ही नहीं | सनातन संवाद

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कुंती का अपराधबोध – जिसे उसने कभी पूरी तरह कहा ही नहीं | सनातन संवाद
Karna

कुंती का अपराधबोध

(जिसे उसने कभी पूरी तरह कहा ही नहीं)

युद्ध खत्म हो चुका था। हजारों लोग मारे जा चुके थे। राज्य पांडवों के पास था। पर एक स्त्री थी जो जीत के बाद भी हल्की नहीं हुई।

कुंती।

लोग उन्हें वीर पुत्रों की माँ कहते हैं। धर्मराज की जननी। भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव की माता। पर उनके जीवन का सबसे बड़ा सत्य उन पाँचों से जुड़ा नहीं था। वह जुड़ा था एक ऐसे पुत्र से जिसे उन्होंने जन्म दिया— और छोड़ दिया।


वह सुबह, जो कभी नहीं भूली गई

कुंती बहुत छोटी थीं जब उन्होंने सूर्य मंत्र का प्रयोग किया। कौतूहल था। भोला विश्वास था। पर परिणाम— एक शिशु। समाज का डर माँ से बड़ा हो गया। उन्होंने उस नवजात को एक टोकरी में रखकर नदी में बहा दिया।

उस दिन से वह माँ थीं— पर अधूरी।

वर्षों बाद… युद्ध से पहले

कुंती जानती थीं कर्ण कौन है। वह हर बार उसे रणभूमि में देखतीं तो उनका हृदय काँपता था। पर उन्होंने सच नहीं बताया। क्यों? क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सत्य अब मुक्ति नहीं देता। वह केवल सब कुछ तोड़ देता।

वह मुलाक़ात
युद्ध से पहले कुंती कर्ण के पास गईं। पहली बार एक माँ अपने पुत्र के सामने खड़ी थी।
कर्ण ने सुना, शांत रहा और बोला— "अब? जब पूरी दुनिया ने मुझे ठुकराया, तब नहीं। अब जब मैं खड़ा हूँ, तब आप आई हैं?" उसने माँ को दोष नहीं दिया, पर स्वीकार भी नहीं किया।

युद्ध के बाद

जब कर्ण मारा गया, और सच सबके सामने आया— पांडव टूट गए। पर सबसे ज्यादा कौन टूटा? कुंती। क्योंकि अब सत्य सुरक्षित था, पर पुत्र नहीं।

यह अपराधबोध क्या था? यह केवल शिशु को नदी में छोड़ने का नहीं था। यह वह अपराध था जो हर बार चुप रहने से बढ़ता गया। हर बार जब कर्ण को अपमानित किया गया, कुंती चुप रहीं।

कुंती बुरी नहीं थीं। वह डरी हुई थीं। समाज से, मर्यादा से, लांछन से। और कई बार डर में लिया गया निर्णय जीवन भर पीछा करता है। कुंती ने राज्य देखा, पुत्रों की विजय देखी, पर उन्होंने यह भी देखा— उनका पहला पुत्र उसी विजय में खो गया।

महाभारत हमें सिखाती है— कुछ गलतियाँ समय सुधार देता है, पर कुछ गलतियाँ समय केवल गहरी कर देता है। कुंती जीती रहीं, पर हल्की कभी नहीं हुईं।

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