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Nasadiya Sukta Rigveda 10.129 | Origin of Universe in Sanatan - Sanatan Gyan | Tu Na Rin

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Nasadiya Sukta Rigveda 10.129 | Origin of Universe in Sanatan - Sanatan Gyan | Tu Na Rin

ब्लॉग – 91
ऋग्वेद का नासदीय सूक्त — जब ऋषि ने पूछा, “सृष्टि से पहले क्या था?”

23 Jul 2026 | 10:00

Nasadiya Sukta Rigveda Sanatan History Gyan

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज हम सनातन इतिहास की उस प्राचीन वैदिक धारा में प्रवेश करेंगे जहाँ ऋषि किसी कथा को सुनाने के बजाय स्वयं सृष्टि के आरंभ पर प्रश्न खड़ा करते हैं। यह है ऋग्वेद के दशम मंडल का प्रसिद्ध नासदीय सूक्त — ऋग्वेद 10.129।

यह विषय इसलिए अद्भुत है क्योंकि यहाँ हमें तैयार उत्तर देने की जल्दी दिखाई नहीं देती। इसके स्थान पर प्रश्न मिलता है — जब यह सृष्टि प्रकट नहीं हुई थी, तब क्या था?

सूक्त की शुरुआत ही अत्यंत गहरी है — उस अवस्था में न स्पष्ट रूप से “सत्” था और न “असत्”। न आज जैसा आकाश था, न हमारे अनुभव का यह विस्तृत जगत। ऋषि उस स्थिति की कल्पना करने का प्रयास करते हैं जहाँ हमारी सामान्य भाषा और हमारी परिचित श्रेणियाँ भी काम करना बंद कर देती हैं।


यहीं सनातन चिंतन की एक महत्वपूर्ण विशेषता सामने आती है।

ऋषि केवल यह नहीं कहते कि “हमने उत्तर बता दिया, अब मान लो।” वे प्रश्न करते हैं। वे अस्तित्व के मूल तक जाने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि नासदीय सूक्त को पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो हजारों वर्ष पहले कोई मनुष्य तारों से भरे आकाश को देखकर पूछ रहा हो — “आखिर यह सब आया कहाँ से?”

सूक्त आगे एक ऐसी प्रारंभिक अवस्था का संकेत करता है जहाँ अंधकार मानो अंधकार से ढका हुआ था। फिर उस रहस्यमय स्थिति में एक मूल सत्ता या “एक” का उल्लेख सामने आता है।

इसके बाद एक और महत्वपूर्ण विचार आता है — काम, अर्थात इच्छा या आकांक्षा।


सूक्त में इच्छा को मन के प्रथम बीज के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका दार्शनिक अर्थ अत्यंत गहरा है। सृष्टि के प्रश्न को यहाँ केवल पदार्थ से नहीं, चेतना और इच्छा के प्रश्न से भी जोड़ा गया।

फिर ऋषि पूछते हैं — इस सृष्टि का विस्तार कैसे हुआ? इसका वास्तविक स्रोत क्या था?

और यहीं नासदीय सूक्त का सबसे सुंदर पक्ष सामने आता है।

अंत में ऋषि अपनी जिज्ञासा को समाप्त नहीं करते।

वे प्रश्न को जीवित छोड़ देते हैं।

जो इस सृष्टि का सर्वोच्च निरीक्षक है, वही शायद जानता हो कि यह सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई — और फिर सूक्त एक ऐसी संभावना भी रखता है कि शायद वह भी न जानता हो।


ध्यान दीजिए।

यहाँ सनातन परंपरा की शक्ति किसी उत्तर को जबरन अंतिम घोषित करने में नहीं, बल्कि उस प्रश्न को पूछने के साहस में दिखाई देती है जिसके सामने मनुष्य की बुद्धि भी विनम्र हो जाती है।

इसलिए नासदीय सूक्त को आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांत बताना उचित नहीं होगा। यह बिग बैंग का प्राचीन वर्णन भी नहीं है। ऐसा दावा वेद के मूल दार्शनिक स्वरूप को छोटा कर देगा।

इसका महत्व कहीं अधिक गहरा है।

यह प्रमाण है कि वैदिक चिंतन में मनुष्य सृष्टि, अस्तित्व, कारण और ज्ञान की सीमाओं पर अत्यंत गंभीर प्रश्न कर रहा था।

सनातन की यात्रा केवल “ईश्वर कौन है?” तक सीमित नहीं रही।


उसने पूछा —

सृष्टि क्यों है?

अस्तित्व कहाँ से आया?

आरंभ से पहले क्या था?

क्या हर प्रश्न का उत्तर मनुष्य जान सकता है?

और यदि नहीं जान सकता, तो क्या अपनी अज्ञानता स्वीकार करना भी ज्ञान का एक रूप है?

शायद यही नासदीय सूक्त की सबसे बड़ी शिक्षा है।

सच्चा ज्ञान केवल उत्तर पाने में नहीं, सही प्रश्न पूछने और अपनी सीमाओं को पहचानने में भी है।

सनातन इतिहास को समझना है तो हमें केवल राजाओं, युद्धों और मंदिरों का इतिहास नहीं पढ़ना होगा। हमें उन प्रश्नों का इतिहास भी पढ़ना होगा जिन्हें हमारे ऋषियों ने ब्रह्मांड के सामने रखा था।

नासदीय सूक्त उन्हीं प्रश्नों में से एक है।

हजारों वर्षों बाद भी प्रश्न हमारे सामने खड़ा है —

यह सृष्टि आखिर आरंभ कैसे हुई?

और शायद ऋषि आज भी हमें यही कह रहे हैं —

खोज बंद मत करना।


शास्त्रीय आधार: ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 129 — नासदीय सूक्त।

✍🏻 लेखक: तु ना रिं 🔱

प्रकाशन: सनातन संवाद

🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला — दिन 91


Labels: Nasadiya Sukta, Rigveda, Sanatan History Gyan, Tu Na Rin, Vedic Wisdom
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