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👉 Click Hereॐ (ॐकार) को सृष्टि की प्रथम ध्वनि क्यों कहा गया? जानिए वह दिव्य रहस्य जिससे ब्रह्मांड की चेतना का आरंभ माना जाता है
जब कोई शिशु इस संसार में जन्म लेता है तो सबसे पहले उसकी आवाज़ सुनाई देती है। वह आवाज़ इस बात का संकेत होती है कि जीवन ने शरीर में प्रवेश कर लिया है। यदि किसी स्थान पर पूर्ण मौन हो और अचानक कोई ध्वनि सुनाई दे तो वह ध्वनि उस मौन को भंग कर देती है और एक नई शुरुआत का संकेत बन जाती है। यही सिद्धांत सनातन दर्शन सम्पूर्ण सृष्टि पर भी लागू करता है। भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले यह घोषणा की थी कि इस ब्रह्मांड की भी एक पहली ध्वनि थी, एक ऐसा मूल कंपन जिससे समय, दिशा, आकाश, ग्रह, नक्षत्र, जीवन और चेतना का विस्तार हुआ। उस आदिम कंपन को उन्होंने केवल एक अक्षर में व्यक्त किया— ॐ। यही कारण है कि सनातन धर्म में ॐ को केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व का मूल स्वरूप माना गया है। यह केवल उच्चारण नहीं है, बल्कि वह दिव्य नाद है जिसे ऋषियों ने समाधि में अनुभव किया और जिसे उन्होंने सृष्टि का प्रथम स्पंदन कहा।
आज जब विज्ञान ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझने के लिए अत्याधुनिक दूरबीनों और जटिल गणनाओं का सहारा ले रहा है, तब भी एक प्रश्न उसके सामने बना हुआ है कि यदि ब्रह्मांड की शुरुआत किसी महाविस्फोट से हुई थी तो उस विस्फोट से पहले क्या था? क्या केवल शून्य था या कोई ऐसी अदृश्य ऊर्जा थी जो समस्त अस्तित्व का कारण बनी? आश्चर्य की बात यह है कि हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों ने भी इसी प्रश्न पर मनन किया था। उन्होंने उत्तर खोजने के लिए बाहर नहीं, भीतर की यात्रा की। ध्यान की गहनतम अवस्था में उन्होंने जिस अनुभव को प्राप्त किया, वही आगे चलकर ॐकार के रूप में जाना गया। उनके लिए ॐ कोई कल्पना नहीं था, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति का विषय था।
सनातन परंपरा में जब भी किसी मंत्र का आरंभ होता है तो उसके पहले ॐ का उच्चारण किया जाता है। यह केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि यह माना जाता है कि ॐ के बिना मंत्र में वह पूर्णता नहीं आती जो उसे ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ सके। जैसे किसी विशाल भवन की नींव दिखाई नहीं देती, पर वही पूरे भवन का आधार होती है, उसी प्रकार ॐ समस्त वैदिक मंत्रों की अदृश्य नींव है। यदि कोई व्यक्ति केवल ॐ का भी शुद्ध भाव से जप करे तो वह स्वयं को उसी दिव्य ऊर्जा से जोड़ने का प्रयास करता है जिसे ऋषियों ने सृष्टि की मूल चेतना कहा।
अक्सर लोग यह समझते हैं कि ॐ केवल हिंदू धर्म का एक धार्मिक चिन्ह है, लेकिन वास्तव में यह किसी एक संप्रदाय की सीमा में बंधा हुआ शब्द नहीं है। यह एक ध्वनि है, और ध्वनि किसी धर्म की नहीं होती। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सभी पर समान रूप से पड़ता है, उसी प्रकार ॐ का सिद्धांत सम्पूर्ण मानवता के लिए है। सनातन धर्म ने इसे पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवन, योग, ध्यान, आयुर्वेद, संगीत, दर्शन और अध्यात्म के प्रत्येक क्षेत्र में इसका स्थान निर्धारित किया। इसका अर्थ यही है कि ॐ केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन में उपस्थित है।
यदि हम वेदों का अध्ययन करें तो हमें बार-बार यह संकेत मिलता है कि ब्रह्मांड का मूल स्वरूप नाद है। इसीलिए भारतीय दर्शन में कहा गया— "नाद ब्रह्म" अर्थात यह सम्पूर्ण सृष्टि स्वयं एक दिव्य ध्वनि का विस्तार है। यहाँ ध्वनि का अर्थ केवल कानों से सुनाई देने वाली आवाज़ नहीं है। यह वह सूक्ष्म कंपन है जो प्रत्येक परमाणु, प्रत्येक ग्रह, प्रत्येक तारे और प्रत्येक जीव के भीतर निरंतर चल रहा है। आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि ब्रह्मांड में कोई भी वस्तु पूर्णतः स्थिर नहीं है। प्रत्येक कण निरंतर गति में है, प्रत्येक परमाणु कंपन कर रहा है। भारतीय ऋषियों ने इसी शाश्वत कंपन को आध्यात्मिक भाषा में ॐ कहा।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऋषियों ने ॐ को बनाया नहीं, बल्कि खोजा। जैसे कोई वैज्ञानिक गुरुत्वाकर्षण का नियम बनाता नहीं, केवल उसे खोजता है, उसी प्रकार ऋषियों ने भी ॐ की रचना नहीं की। उन्होंने उस आदिम ध्वनि का अनुभव किया जो पहले से ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त थी। यही कारण है कि सनातन धर्म में ॐ को मनुष्य की रचना नहीं, बल्कि ईश्वर की अभिव्यक्ति माना गया है। यह शब्द किसी भाषा से उत्पन्न नहीं हुआ। उल्टा कहा जाए तो सभी भाषाओं के अस्तित्व से पहले ॐ का अस्तित्व था।
जब हम ॐ का उच्चारण करते हैं तो वास्तव में तीन ध्वनियाँ क्रमशः निकलती हैं— "अ", "उ" और "म्"। इन तीनों का मिलन ही ॐ कहलाता है। भारतीय दर्शन के अनुसार "अ" सृष्टि के आरंभ का प्रतीक है, "उ" पालन का और "म्" संहार या परिवर्तन का। इसका अर्थ यह हुआ कि ॐ केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है। जन्म, जीवन और मृत्यु—तीनों उसी में समाहित हैं। यही कारण है कि जब किसी साधक का ध्यान गहरा होता है तो वह केवल शब्द नहीं सुनता, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व की लय को अनुभव करने लगता है।
भारतीय ऋषियों का मानना था कि यह ब्रह्मांड किसी यांत्रिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं है। इसके पीछे चेतना कार्य कर रही है। यह चेतना स्थिर नहीं, बल्कि स्पंदित है। इसी स्पंदन से समय उत्पन्न हुआ, दिशा बनी, तत्व प्रकट हुए और जीवन का विस्तार हुआ। यदि स्पंदन समाप्त हो जाए तो सृष्टि भी समाप्त हो जाएगी। इसलिए ॐ को केवल प्रारंभ नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का भी आधार माना गया है। यह हर क्षण चल रही उस अनंत प्रक्रिया का प्रतीक है जो सृष्टि को निरंतर गतिमान रखती हैं।
यहाँ एक अत्यंत रोचक प्रश्न उठता है। यदि ॐ सृष्टि की पहली ध्वनि है, तो क्या उस समय सुनने वाला कोई था? सनातन दर्शन इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत सूक्ष्म ढंग से देता है। उसके अनुसार उस समय कोई मनुष्य नहीं था, कोई जीव नहीं था, कोई कान नहीं थे, फिर भी ध्वनि थी क्योंकि ध्वनि का अस्तित्व सुनने वाले पर निर्भर नहीं करता। जैसे सूर्य के उदय होने से पहले भी प्रकाश की संभावना विद्यमान रहती है, वैसे ही चेतना का प्रथम स्पंदन अपने आप में पूर्ण था। बाद में उसी से इंद्रियाँ, मन, बुद्धि और समस्त जीव उत्पन्न हुए।
यही कारण है कि उपनिषदों में ॐ को केवल उच्चारण करने योग्य शब्द नहीं कहा गया, बल्कि उसे ब्रह्म का प्रत्यक्ष प्रतीक माना गया। जब साधक बार-बार ॐ का जप करता है तो वह केवल ध्वनि नहीं दोहराता, बल्कि अपने भीतर उस मूल कंपन के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि का जन्म हुआ। यही साधना धीरे-धीरे मन को स्थिर करती है, विचारों को शांत करती है और व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप के निकट ले जाती है।
हमारे दैनिक जीवन में भी यदि ध्यान से देखें तो प्रत्येक क्रिया किसी न किसी कंपन से जुड़ी हुई है। हृदय की धड़कन एक लय में चलती है, श्वास एक लय में आती-जाती है, समुद्र की लहरें लय में उठती हैं, ऋतुएँ निश्चित क्रम में बदलती हैं, ग्रह अपनी कक्षाओं में संतुलित गति से चलते हैं। ऐसा लगता है मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड किसी अदृश्य संगीत पर नृत्य कर रहा हो। भारतीय ऋषियों ने इसी ब्रह्मांडीय संगीत को ॐ का अनंत विस्तार कहा।
आज दुनिया के अनेक वैज्ञानिक और ध्वनि-चिकित्सा के विशेषज्ञ भी यह स्वीकार करने लगे हैं कि विशेष प्रकार की ध्वनियाँ मनुष्य के मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालती हैं। यद्यपि वैज्ञानिक दृष्टि और आध्यात्मिक दृष्टि अलग-अलग पद्धतियों से कार्य करती हैं, फिर भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि ध्वनि की शक्ति को दोनों ही स्वीकार करते हैं। सनातन परंपरा हजारों वर्षों से यही कहती आई है कि सही भाव और सही विधि से किया गया ॐ का जप केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि चेतना को परिष्कृत करने का एक माध्यम भी है।
यही कारण है कि भारत के प्राचीन गुरुकुलों में शिक्षा आरंभ करने से पहले, यज्ञ से पहले, ध्यान से पहले, तपस्या से पहले और यहाँ तक कि वेदों के अध्ययन से पहले भी ॐ का उच्चारण कराया जाता था। इसका उद्देश्य केवल शुभारंभ करना नहीं था, बल्कि विद्यार्थी के मन को उस दिव्य चेतना से जोड़ना था जिससे ज्ञान का वास्तविक प्रकाश उत्पन्न होता है। सनातन परंपरा का विश्वास है कि जब मनुष्य अपने भीतर के शोर को शांत कर देता है, तभी वह उस सूक्ष्म नाद को सुनने योग्य बनता है जिसे ऋषियों ने सृष्टि की प्रथम ध्वनि कहा।
Labels: Omkar rahasya, First sound of universe, Cosmic vibration, Naad brahma, Vedic science
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