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👉 Click Hereॐ (ॐकार) को सृष्टि की प्रथम ध्वनि क्यों कहा गया? जानिए वह दिव्य रहस्य जिससे ब्रह्मांड की चेतना का आरंभ माना जाता है (भाग–2)
यदि हम सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों की यात्रा करें तो एक बात अत्यंत स्पष्ट दिखाई देती है कि भारतीय ऋषियों ने कभी भी केवल विश्वास के आधार पर धर्म की स्थापना नहीं की। उन्होंने अनुभव को सबसे बड़ा प्रमाण माना। यही कारण है कि जब वे ॐ को सृष्टि की प्रथम ध्वनि कहते हैं, तो उसके पीछे केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अनुभूति का आधार भी है। वेदों और उपनिषदों में अनेक स्थानों पर यह संकेत मिलता है कि समस्त ब्रह्मांड एक अदृश्य चेतना से उत्पन्न हुआ और उस चेतना का पहला स्पंदन ही प्रणव अर्थात् ॐ है। यह ध्वनि किसी वाद्ययंत्र से उत्पन्न नहीं हुई, किसी मुख से निकली नहीं, बल्कि स्वयं अस्तित्व की जागृति का प्रथम संकेत बनी। इसीलिए ॐ को केवल ध्वनि नहीं, बल्कि परम चेतना का उद्घोष कहा गया।
भारतीय दर्शन में एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया गया है। जब कोई शांत झील बिल्कुल स्थिर होती है और उसमें एक छोटा-सा कंकड़ गिरता है, तो जल में वृत्ताकार तरंगें बनने लगती हैं। कंकड़ छोटा होता है, लेकिन उसका प्रभाव पूरे जल में फैल जाता है। इसी प्रकार परम शांति की अवस्था में स्थित ब्रह्म जब सृजन की इच्छा करता है, तब चेतना में पहला स्पंदन उत्पन्न होता है। वही स्पंदन धीरे-धीरे अनंत तरंगों में बदलकर सृष्टि के रूप में प्रकट होता है। ऋषियों ने इसी आद्य तरंग को ॐ कहा। इसलिए ॐ का संबंध केवल शब्द से नहीं, बल्कि सृष्टि की पहली हलचल से है।
उपनिषदों में कहा गया है कि जो ॐ को समझ लेता है, वह केवल एक अक्षर का अर्थ नहीं समझता, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की संरचना को समझने लगता है। इसका कारण यह है कि ॐ स्वयं में संपूर्ण अस्तित्व का सार है। मनुष्य का जन्म, उसका जीवन, उसका अंत और उसके बाद की यात्रा—सब उसी एक ध्वनि में समाहित माने गए हैं। इसीलिए भारतीय साधना पद्धति में ॐ का जप किसी विशेष इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि आत्मबोध के लिए किया जाता है।
एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठता है कि यदि ॐ इतना महान है तो क्या इसका उल्लेख केवल उपनिषदों में ही मिलता है? उत्तर है—नहीं। वेदों से लेकर गीता, योगशास्त्र, तंत्र, पुराण और अनेक स्मृतियों तक ॐ का महत्व निरंतर दिखाई देता है। प्रत्येक ग्रंथ उसे अलग दृष्टिकोण से समझाता है, किंतु निष्कर्ष एक ही रहता है कि ॐ कोई सामान्य ध्वनि नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान का बीज है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में इसे "प्रणव" कहा गया, जिसका अर्थ है वह ध्वनि जो जीवन को प्राण देती है।
जब हम भगवान ब्रह्मा की सृष्टि की कथा पढ़ते हैं तो एक रोचक तथ्य सामने आता है। ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता कहा गया, किंतु ब्रह्मा भी स्वयं परमब्रह्म से उत्पन्न हुए। इसका अर्थ यह हुआ कि सृष्टि करने वाला भी उस सर्वोच्च चेतना का ही अंश है। अनेक दार्शनिक परंपराएँ यह मानती हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना किसी भौतिक उपकरण से नहीं, बल्कि दिव्य ज्ञान के आधार पर की। वही दिव्य ज्ञान वेद कहलाए। और वेदों का प्रारंभ जिस प्रणव से होता है, वही ॐ है। इस दृष्टि से देखा जाए तो ॐ ब्रह्मा से भी पहले की चेतना का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि इसे सृष्टि का प्रथम नाद कहा गया।
सनातन धर्म में यह भी कहा गया है कि सृष्टि का निर्माण केवल पदार्थों से नहीं हुआ। पहले चेतना प्रकट हुई, फिर ऊर्जा, फिर तत्व और उसके बाद दृश्य संसार अस्तित्व में आया। आधुनिक विज्ञान भी यह मानता है कि ब्रह्मांड के प्रारंभिक क्षणों में केवल ऊर्जा थी, बाद में वही ऊर्जा विभिन्न रूपों में परिवर्तित होकर पदार्थ बनी। यद्यपि विज्ञान और अध्यात्म की भाषा अलग है, लेकिन दोनों ही यह स्वीकार करते हैं कि दृश्य संसार से पहले कोई सूक्ष्म अवस्था अवश्य थी। भारतीय ऋषियों ने उसी सूक्ष्म अवस्था को चेतना का क्षेत्र कहा और उसके प्रथम spandan को ॐ के रूप में अनुभव किया।
योग दर्शन में ॐ का महत्व और भी गहरा हो जाता है। योग केवल शरीर को स्वस्थ बनाने का माध्यम नहीं है। उसका अंतिम लक्ष्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का अनुभव कराना है। जब योगी ध्यान की अत्यंत गहरी अवस्था में प्रवेश करता है तो बाहरी ध्वनियाँ उसके लिए महत्वहीन हो जाती हैं। धीरे-धीरे उसका मन भीतर की सूक्ष्म ध्वनियों की ओर जागृत होने लगता. अनेक योगियों ने अपने अनुभवों में लिखा है कि अंतर्मन की पूर्ण शांति में एक निरंतर गूँजती हुई दिव्य ध्वनि का अनुभव होता है। भारतीय योग परंपरा इसी अनुभव को अनाहत नाद कहती है। यह ऐसी ध्वनि है जो किसी टकराव से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि स्वयं चेतना के भीतर निरंतर प्रवाहित होती रहती है। इसी अनाहत नाद का सबसे संक्षिप्त प्रतीक ॐ माना गया है।
यदि कोई व्यक्ति केवल बाहरी दृष्टि से ॐ को देखे तो उसे लगेगा कि यह केवल तीन अक्षरों का मेल है, लेकिन भारतीय दर्शन इसकी व्याख्या अत्यंत व्यापक रूप में करता है। "अ" केवल पहला स्वर नहीं, बल्कि सृष्टि के उद्भव का प्रतीक है। "उ" केवल दूसरा स्वर नहीं, बल्कि जीवन के विस्तार, संरक्षण और संतुलन का प्रतीक है। "म्" केवल अंतिम ध्वनि नहीं, बल्कि उस अवस्था का संकेत है जहाँ सब कुछ पुनः मूल चेतना में विलीन हो जाता है। इन तीनों के बाद जो मौन आता है, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वह मौन यह बताता है कि सृष्टि का अंत भी शून्यता नहीं, बल्कि परम शांति में प्रवेश है।
यही कारण है कि जब कोई साधक ॐ का उच्चारण करता है तो वह केवल शब्द नहीं बोलता। उसके भीतर सृष्टि के संपूर्ण चक्र का प्रतीकात्मक अनुभव छिपा होता है। जन्म, विकास, परिवर्तन और अंत—ये चारों अवस्थाएँ उसी एक ध्वनि में समाहित हैं। इसीलिए ऋषियों ने कहा कि जो ॐ का वास्तविक अर्थ समझ लेता है, वह जीवन और मृत्यु के भय से ऊपर उठने लगता है।
सनातन परंपरा में मंदिरों की घंटियों, शंखनाद और वैदिक मंत्रों का भी एक गहरा संबंध ॐ से माना गया है। इन सभी ध्वनियों का उद्देश्य केवल धार्मिक वातावरण बनाना नहीं है। उनका लक्ष्य मनुष्य के मन को उस मूल कंपन के साथ सामंजस्य स्थापित कराना है जो सृष्टि के आरंभ से निरंतर प्रवाहित हो रहा है। इसीलिए किसी भी यज्ञ, पूजा, अनुष्ठान या ध्यान की शुरुआत में सबसे पहले ॐ का उच्चारण किया जाता है। यह मान्यता है कि जब तक साधक स्वयं को उस मूल चेतना से नहीं जोड़ता, तब तक उसकी साधना अधूरी रहती हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय संगीत के महान आचार्यों ने भी स्वर और नाद की साधना में ॐ को अत्यंत महत्वपूर्ण माना। उनका विश्वास था कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने का माध्यम है। जब स्वर पूर्ण संतुलन में होता है, तब उसमें वही दिव्यता प्रकट होने लगती है जिसे ऋषियों ने नाद ब्रह्म कहा। यही कारण है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी आध्यात्मिकता का आधार नाद को माना गया है।
प्राचीन गुरुओं का यह भी मत था कि ॐ का जप केवल आवाज़ से नहीं, बल्कि जीवन से होना चाहिए। यदि मन अशांत है, विचार दूषित हैं, व्यवहार कठोर है और जीवन असंतुलित है, तो केवल उच्चारण से उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। ॐ का वास्तविक अर्थ तब प्रकट होता है जब मनुष्य अपने भीतर भी वही संतुलन, वही शांति और वही करुणा विकसित करता है जो ब्रह्मांड की मूल चेतना का स्वभाव है। इसलिए सनातन धर्म में साधना केवल जप तक सीमित नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण से भी जुड़ी हुई है।
इसी संदर्भ में अनेक संतों ने कहा कि ॐ को सुनने के लिए कानों की नहीं, बल्कि जागृत चेतना की आवश्यकता होती है। बाहर का शोर जितना कम होगा, भीतर का नाद उतना स्पष्ट सुनाई देगा। यही कारण है कि हिमालय की गुफाओं में तप करने वाले ऋषि बाहरी संसार से दूर चले जाते थे। उनका उद्देश्य संसार का त्याग नहीं था, बल्कि उस सूक्ष्म ध्वनि को अनुभव करना था जिसे सामान्य जीवन की भागदौड़ में सुन पाना लगभग असंभव हो जाता है।
जब हम इन सभी तथ्यों को एक साथ जोड़कर देखते हैं तो स्पष्ट होता है कि ॐ को सृष्टि की प्रथम ध्वनि केवल धार्मिक आस्था के कारण नहीं कहा गया। उसके पीछे वेदों का ज्ञान, उपनिषदों की अनुभूति, योगियों का अनुभव, संतों की साधना और भारतीय दर्शन की हजारों वर्षों की परंपरा जुड़ी हुई है। यही कारण है कि आज भी करोड़ों लोग ॐ का उच्चारण केवल एक मंत्र की तरह नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को ब्रह्मांड की मूल चेतना से जोड़ने के प्रयास के रूप में करते हैं।
Labels: Omkar gyan part 2, Cosmic manifestation, Pranav mantra philosophy, Yogic transformation, Sanatan awakening
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