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👉 Click Hereभारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के शिल्पकार डॉ. विक्रम साराभाई की पुण्यतिथि
📜 30 दिसंबर 📜 | संकेत| सनातन संवाद
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| Source wikipedia |
जन्म: 12 अगस्त 1919
महानिर्वाण: 30 दिसंबर 1971
डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई भारत के उन महान वैज्ञानिकों में से थे, जिन्होंने विज्ञान को प्रयोगशालाओं से निकालकर आम जनजीवन से जोड़ा। उन्हें सही अर्थों में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। वैज्ञानिक होने के साथ-साथ वे एक दूरदर्शी विचारक, कुशल प्रशासक और समाज के लिए विज्ञान को उपयोगी बनाने वाले प्रेरणास्रोत थे।
डॉ. साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को गुजरात के अहमदाबाद में एक समृद्ध और प्रगतिशील परिवार में हुआ। उनके पिता अंबालाल साराभाई एक प्रसिद्ध उद्योगपति थे और माता सरला देवी समाजसेवा में सक्रिय थीं। वे आठ भाई-बहनों में से एक थे। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने माता-पिता द्वारा संचालित मोंटेसरी पद्धति के विद्यालय से प्राप्त की।
उनका बचपन ऐसे वातावरण में बीता जहाँ देश के महान चिंतक और नेता अक्सर आया करते थे। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, मौलाना आज़ाद, सी.वी. रमन जैसे व्यक्तित्वों के सान्निध्य ने उनके विचारों को गहराई से प्रभावित किया।
उच्च शिक्षा के लिए वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए, जहाँ 1940 में उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान में डिग्री प्राप्त की। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे भारत लौट आए और बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सी.वी. रमन के मार्गदर्शन में शोध कार्य किया। इसी दौरान उनकी रुचि सौर भौतिकी और ब्रह्मांडीय किरणों में विकसित हुई।
1947 में पीएचडी पूरी करने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) की स्थापना की, जो आगे चलकर भारत के अग्रणी शोध संस्थानों में शामिल हुई। इस संस्था को आगे वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद और परमाणु ऊर्जा विभाग का भी सहयोग प्राप्त हुआ।
डॉ. साराभाई ने ब्रह्मांडीय किरणों और सौर गतिविधियों पर गहन शोध किया और यह सिद्ध किया कि इनके प्रभाव वैश्विक और दीर्घकालिक होते हैं। उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की अपार संभावनाओं को बहुत पहले ही पहचान लिया था।
1957 में सोवियत संघ द्वारा स्पुतनिक-1 के प्रक्षेपण ने उन्हें अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में निर्णायक कदम उठाने के लिए प्रेरित किया। उनके नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (INCOSPAR) का गठन हुआ।
उन्होंने केरल के तिरुवनंतपुरम के पास थुम्बा को भारत के पहले रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र के रूप में चुना। 21 नवंबर 1963 को यहीं से भारत का पहला रॉकेट सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। आगे चलकर थुम्बा रॉकेट केंद्र को अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिली।
होमी जहांगीर भाभा के असामयिक निधन के बाद, 1966 में डॉ. साराभाई ने परमाणु ऊर्जा आयोग का नेतृत्व संभाला। उनका सपना था कि विज्ञान केवल उच्च वर्ग तक सीमित न रहे, बल्कि उसकी शक्ति से आम नागरिक का जीवन बेहतर बने।
उनकी सोच और प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम विश्व में अपनी अलग पहचान रखता है।
डॉ. विक्रम साराभाई को उनके योगदान के लिए:
- शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1962)
- पद्म भूषण (1966)
- पद्म विभूषण (1972, मरणोपरांत)
से सम्मानित किया गया।
30 दिसंबर 1971 को नींद में ही उनका निधन हो गया, लेकिन उनके सपने आज भी भारत को अंतरिक्ष की ऊँचाइयों तक ले जा रहे हैं।
🌹 डॉ. विक्रम साराभाई को कोटि-कोटि नमन 🌹
सनातन संवाद
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