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समभाव ही सनातन धर्म का सार है

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समभाव ही सनातन धर्म का सार है

समभाव ही सनातन धर्म का सार है

sanatan

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस मौन सत्य की बात करने आया हूँ जिसे समझ लेने पर धर्म बोझ नहीं रहता, साधना कठिन नहीं लगती और जीवन अपने आप सरल हो जाता है — समभाव ही सनातन धर्म का सार है। यह कोई भावनात्मक नारा नहीं है, न ही उदासीनता का उपदेश। समभाव वह दृष्टि है जिससे जीवन को देखा जाए, वह संतुलन है जिससे जीवन जिया जाए और वह प्रज्ञा है जिससे मनुष्य मुक्त होता है।

समभाव का अर्थ यह नहीं कि सुख-दुख का अनुभव न हो या लाभ-हानि का ज्ञान न रहे। समभाव का अर्थ है कि इन सबके बीच भीतर की स्थिरता बनी रहे। जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं, पर उसकी गहराई स्थिर रहती है, वैसे ही परिस्थितियाँ बदलें, फिर भी चेतना अपना केंद्र न छोड़े। यही समभाव है।

सनातन धर्म ने कभी जीवन से भागना नहीं सिखाया। उसने जीवन को समझकर, संतुलन के साथ जीने की कला दी। जो सुख में उन्मत्त हो जाए और दुख में टूट जाए, वह जीवन के भार से दब जाता है। पर जो दोनों में सम रहता है, वही जीवन-सागर को पार करता है। इस समता में कठोरता नहीं, बल्कि करुणा है, और वह भी बिना आसक्ति के।

समभाव अन्याय के सामने चुप रहना नहीं है। यह कायरता नहीं, विवेक है। समभाव में स्थित व्यक्ति क्रोध से नहीं, धर्म से कार्य करता है। वह अन्याय के सामने खड़ा होता है, पर भीतर द्वेष नहीं पालता। यही सनातन की मर्यादा है — दृढ़ता के साथ करुणा।

समभाव हमें यह सिखाता है कि घटनाओं को नहीं, अपनी प्रतिक्रिया को साधो। घटनाएँ हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, पर प्रतिक्रिया हमेशा हमारे भीतर से निकलती है। जो अपनी प्रतिक्रिया को साध लेता है, वही वास्तव में स्वतंत्र होता है। वही प्रशंसा से फूलता नहीं और निंदा से टूटता नहीं।

जीवन के अधिकांश दुख अपेक्षाओं से जन्म लेते हैं। हम चाहते हैं कि संसार हमारे अनुसार चले। जब ऐसा नहीं होता, मन असंतुलित हो जाता है। समभाव अपेक्षा को समझ में बदल देता है। समझ आते ही शिकायत मिटती है और शांति प्रकट होती है।

समभाव कोई क्षणिक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन की निरंतर साधना है। बोलते समय, सुनते समय, निर्णय लेते समय, सफलता और असफलता दोनों में। जब यह दृष्टि जीवन में उतरती है, तब भय ढीला पड़ता है और विवेक मजबूत होता है।

समभाव हमें स्वयं से, दूसरों से और प्रकृति से जोड़ता है। जो समभाव में स्थित है, वह तुलना नहीं करता, इसलिए ईर्ष्या नहीं पालता। वह अहंकार में नहीं जीता और न ही हीनता में। वह केवल अपने कर्म में उपस्थित रहता है। यही कर्मयोग की परिपक्वता है।

सनातन धर्म का सौंदर्य यही है कि उसने न भोग की अतिशयता सिखाई, न त्याग की कठोरता। उसने संतुलन का मार्ग दिया। यही मार्ग मनुष्य को भीतर से स्थिर बनाता है और जीवन को अर्थपूर्ण करता है।

अंततः समभाव कोई ऊँची अवस्था नहीं, बल्कि स्वाभाविक स्थिति है। जब मनुष्य अपने केंद्र में टिक जाता है, तब हर कर्म पूजा बन जाता है और हर क्षण साधना।

इसीलिए स्मरण रहे — समभाव कोई विकल्प नहीं, सनातन धर्म का सार है। जो इसे समझ लेता है, वह जीवन को समझ लेता है; और जो इसे जी लेता है, वह जीवन में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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