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योग — शरीर नहीं, आत्मा की प्राचीन विज्ञान

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योग — शरीर नहीं, आत्मा की प्राचीन विज्ञान

योग — शरीर नहीं, आत्मा की प्राचीन विज्ञान

sanatan

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस शब्द का वास्तविक अर्थ समझाने आया हूँ जिसे दुनिया ने व्यायाम बना दिया, पर सनातन ने जिसे मोक्ष का मार्ग कहा — योग।

योग का अर्थ है — योग करना, जोड़ना। किससे जोड़ना? शरीर से नहीं, आत्मा को ब्रह्म से।

पतंजलि ने योग को केवल आसनों तक सीमित नहीं किया। उन्होंने अष्टांग योग का मार्ग दिया — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

आसन शरीर को स्वस्थ रखते हैं, पर योग का उद्देश्य शरीर नहीं, चित्त की वृत्तियों का निरोध है।

योग वह प्रक्रिया है जिसमें मन की अशांति शांत होती है, इच्छाएँ नियंत्रित होती हैं, और आत्मा स्वयं को पहचानने लगती है।

प्राचीन ऋषि जंगलों में केवल बैठकर श्वास नहीं देखते थे। वे अपने भीतर के ब्रह्मांड का निरीक्षण करते थे।

जब श्वास स्थिर होती है, तो मन स्थिर होता है। जब मन स्थिर होता है, तो सत्य स्पष्ट होता है।

सनातन कहता है — ध्यान कोई तकनीक नहीं, ध्यान एक स्थिति है।

आज का संसार दवाओं से शरीर को ठीक करना चाहता है, पर योग मनुष्य को जड़ से स्वस्थ करता है।

योग धर्म नहीं पूछता, जाति नहीं पूछता, भाषा नहीं पूछता। योग केवल पात्रता देखता है — साधना और अनुशासन।

यही कारण है कि योग भारत में जन्मा, पर संपूर्ण विश्व में फैला।

और अंत में यही सत्य — योग करने वाला नहीं, योग जीने वाला सच में मुक्त होता है।

✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला


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