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अभिमन्यु — जब धर्म मौन हो गया

अभिमन्यु — जब धर्म मौन हो गया

A dramatic digital art representation of Abhimanyu fighting alone in the center of the Chakravyuh with a chariot wheel, symbolizing ultimate courage against injustice

यह कथा केवल अभिमन्यु की नहीं है। यह उस दिन की कथा है, जब धर्म ने मौन ओढ़ लिया था, और अधर्म ने नियमों को कुचलकर विजय पाने का प्रयास किया था। कुरुक्षेत्र का तेरहवाँ दिन बाहरी दृष्टि से एक सामान्य युद्ध-दिवस था, पर भीतर ही भीतर वह दिन भविष्य का निर्णय लिख रहा था। आकाश में सूर्य था, पर धरती पर विवेक का सूर्य अस्त हो चुका था। आज युद्ध केवल अस्त्रों से नहीं लड़ा जा रहा था—आज युद्ध मन, नीयत और निर्णयों का था।

कौरवों ने आज ऐसा व्यूह रचा था, जो केवल युद्ध-कौशल नहीं, बल्कि छल और समय-प्रबंधन की पराकाष्ठा था। चक्रव्यूह। उसमें प्रवेश करना ही आधा युद्ध जीत लेना था, और उससे निकलना लगभग असंभव। पांडवों की सभा में यह तथ्य सब जानते थे। अर्जुन को इस विद्या का पूर्ण ज्ञान था, पर उन्हें दूर भेज दिया गया था—यह भी युद्ध का ही एक नियमविहीन प्रहार था। सभा में मौन था, ऐसा मौन जिसमें भय, विवशता और उत्तरदायित्व तीनों एक साथ खड़े थे।

उसी मौन को तोड़कर आगे आया एक किशोर—अभिमन्यु। न पूरी दाढ़ी आई थी, न जीवन का भार देखा था, पर आँखों में वह तेज था जो केवल जन्म से नहीं, संस्कार से आता है। उसने कहा कि उसे चक्रव्यूह में प्रवेश की विद्या आती है। बाहर निकलने का प्रश्न आया तो उसने वही कहा, जो वीर कहते हैं—“परिस्थिति देख लेंगे।” यह वाक्य साहस नहीं था, यह भविष्य को स्वीकार करने का क्षण था। वह जानता था कि वह अधूरा है, पर धर्म अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता—यही उसका विश्वास था।

अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रविष्ट हुआ और परतें टूटने लगीं। जो रचना अजेय मानी जाती थी, वह एक-एक कर ढहती चली गई। कौरव सेना चकित थी। उन्हें यह नहीं दिख रहा था कि वे एक बालक से युद्ध कर रहे हैं, उन्हें यह दिख रहा था कि उनके सामने एक अग्नि चल रही है। भीतर अभिमन्यु बढ़ता गया, बाहर पांडव सेना आगे बढ़ना चाहती थी, पर एक नाम उनके मार्ग में दीवार बन गया—जयद्रथ। उसने उन्हें रोक लिया, और समय वहीँ ठहर गया जहाँ से पतन आरंभ होता है।

भीतर का युद्ध और बाहर का मौन—यही वह अंतर था जिसने इतिहास को बदल दिया। अभिमन्यु अब अकेला था। उस पर एक नहीं, अनेक महारथी टूट पड़े। नियम कहता था कि एक योद्धा पर अनेक योद्धा एक साथ आक्रमण नहीं करेंगे। धर्म कहता था कि निहत्थे पर वार नहीं होगा। पर उस दिन नियम भी टूटे, और धर्म भी मौन रहा। शस्त्र टूटे, रथ गिरा, धनुष छिन गया—पर अभिमन्यु नहीं रुका। उसने मुट्ठियों से युद्ध किया, रथ के टूटे पहियों से प्रहार किया, और जब वह भी न बचा, तब भी वह खड़ा रहा। वह गिरा नहीं—उसे गिराया गया।

यहीं प्रश्न उठता है—अभिमन्यु का वास्तविक दोषी कौन था। केवल वे जिन्होंने उस पर सामूहिक आक्रमण किया। नहीं। वे तो अधर्मी थे, उनसे अधर्म की अपेक्षा थी। असली प्रश्न वहाँ उठता है जहाँ धर्म पक्ष मौन हो जाता है। जहाँ योजना अधूरी थी। जहाँ सहायता समय पर नहीं पहुँची। जहाँ यह जानते हुए भी कि एक बालक मृत्यु के पथ पर बढ़ रहा है, कोई उसे रोक न सका—या रोकना नहीं चाहा।

और फिर आता है सबसे कठिन प्रश्न—कृष्ण। वे सब देख रहे थे। वे जानते थे कि क्या हो रहा है, क्या होने वाला है। फिर उन्होंने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया। क्योंकि हर युद्ध का उद्देश्य केवल प्राण बचाना नहीं होता। कभी-कभी इतिहास को उसकी कुरूपता स्वयं दिखानी पड़ती है। अभिमन्यु की मृत्यु ने कौरवों के अधर्म को ऐसा उजागर किया कि उसके बाद कोई संदेह शेष नहीं रहा। वह मृत्यु नहीं थी, वह एक उद्घाटन था।

उस दिन अभिमन्यु नहीं मरा। उस दिन युद्ध की मर्यादा मरी। उस दिन धर्म ने सीखा कि केवल सही होना पर्याप्त नहीं—सही समय पर खड़ा होना भी आवश्यक है।

अभिमन्यु की देह धरती पर गिरी, पर उसका बल पांडवों की शपथ बन गया। भीम का क्रोध दिशा पा गया। अर्जुन ने काल का रूप धारण किया। युद्ध अब केवल राज्य के लिए नहीं रहा—वह न्याय के लिए हो गया। उस एक बालक ने, जो अधूरी विद्या के साथ पूर्ण संकल्प लेकर उतरा था, पूरे युद्ध का नैतिक भार बदल दिया।

महाभारत हमें यही सिखाता है कि अधर्म केवल शस्त्र उठाने से नहीं होता। कभी-कभी अधर्म मौन से जन्म लेता है। और कभी-कभी सबसे बड़ा बलिदान वह होता है, जो दूसरों को जगाने के लिए दिया जाए। अभिमन्यु उसी जागरण का नाम है।

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