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👉 Click Hereभक्ति की दृष्टि — जब प्रभु स्वयं मार्ग बनते हैं
यह कथा उस काल की है जब आँखों से देखना आवश्यक नहीं था, क्योंकि जिनके हृदय खुले होते थे, उनके लिए प्रभु स्वयं मार्ग बन जाते थे।
एक गाँव में एक नेत्रहीन वृद्ध रहता था। जन्म से ही उसने संसार को कभी नहीं देखा था। लोग उसे दया की दृष्टि से देखते थे, पर उसे कभी इस बात का दुख नहीं हुआ कि वह देख नहीं सकता। वह कहा करता था—“जिसे सब दिखता है, वह अक्सर प्रभु को नहीं देख पाता; और जिसे कुछ नहीं दिखता, उसके पास देखने के लिए केवल वही बचते हैं।”
उस वृद्ध का जीवन बहुत सीमित था। सुबह उठकर वह अपने आँगन में बैठता, मिट्टी की दीवार से पीठ लगाकर एक छोटा सा दीपक जलाता और उसी के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाता। न उसके पास मूर्ति थी, न चित्र। जब उससे पूछा जाता कि वह किसके सामने दीप जलाता है, तो वह मुस्कुराकर कहता—“जो भीतर बैठा है, उसी के लिए।”
उसकी प्रार्थना भी अनोखी थी। वह कुछ माँगता नहीं था। बस धीरे-धीरे कहता—“आज भी मेरे साथ चलना… जैसे रोज़ चलते हो।” लोगों को यह बात समझ नहीं आती थी।
उस वृद्ध की एक आदत थी। हर शाम सूर्यास्त के बाद वह अपने घर से निकलता और गाँव के बाहर बने पुराने कुएँ तक जाता। रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था, पत्थर थे, गड्ढे थे। सबको आश्चर्य होता कि वह बिना देखे, बिना सहारे, रोज़ वहाँ कैसे पहुँच जाता है। जब उससे पूछा गया, तो उसने कहा—“मैं अकेला नहीं चलता।”
एक दिन कुछ शरारती लड़कों ने मज़ाक करने की सोची। उन्होंने रास्ते में पत्थर हटा दिए, कहीं गड्ढा बना दिया, कहीं लकड़ी रख दी। शाम को वृद्ध दीप जलाकर निकला। गाँव वाले दूर से देखने लगे।
वृद्ध धीरे-धीरे चला। जहाँ पत्थर था, वहाँ उसके कदम अपने आप रुक गए। जहाँ गड्ढा था, वहाँ उसने अनायास दिशा बदल ली। वह बिना गिरे, बिना रुके, कुएँ तक पहुँच गया।
उसी रात, वृद्ध अपने आँगन में बैठा था। अचानक उसे लगा जैसे किसी ने उसका हाथ थाम लिया हो। वह चौंका नहीं। बस मुस्कुराकर बोला, “आज देर हो गई।”
एक मधुर स्वर आया—“आज रास्ता बदला हुआ था, इसलिए समय लग गया।”
वृद्ध का कंठ भर आया। उसने काँपते हाथों से उस अदृश्य हाथ को पकड़ा और कहा, “तो सच में… तुम हर दिन मेरे साथ चलते हो?”
उत्तर मिला—“जब तुमने आँखें नहीं माँगीं, बल्कि विश्वास माँगा, तभी से।”
उस क्षण वृद्ध जान गया कि सामने कौन है। वह कोई और नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण थे—जो आँखों से नहीं, भाव से दिखते हैं।
वृद्ध रो पड़ा। उसने कहा, “लोग कहते हैं मैं अंधा हूँ।”
कृष्ण ने हँसकर कहा, “अंधे तो वे हैं, जो सब देखकर भी मुझ पर भरोसा नहीं करते।”
अगली सुबह गाँव में यह खबर फैल गई कि वह वृद्ध शांतिपूर्वक देह त्याग गया। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी, और हाथ ऐसे जुड़े थे, मानो किसी का सहारा थामे हों।
लोगों ने कहा—वह अंधा था, पर उसका मार्ग कभी नहीं भटका।
क्योंकि जिसने भीतर का दीप जला लिया हो, उसके लिए प्रभु स्वयं आँख बन जाते हैं।
सनातन संवाद
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