जीवन के प्रकाश की स्तुति: ऋग्वेद का प्रथम मंत्र
1. मूल संस्कृत मंत्र
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम्॥
(ऋग्वेद – मण्डल 1, सूक्त 1, मंत्र 1)
2. शब्दार्थ
- अग्निमीळे — मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ।
- पुरोहितं — जो यज्ञ में अग्रणी हैं (पुरो + हित)।
- यज्ञस्य — यज्ञ के।
- देवमृत्विजम् — दिव्य प्रकाश से युक्त, ऋतु के अनुसार कार्य करने वाले।
- होतारं — देवताओं का आह्वान करने वाले।
- रत्नधातमम् — श्रेष्ठ रत्नों, सुखों और ऐश्वर्य को धारण कराने वाले।
3. सरल हिंदी अर्थ
मैं अग्नि देव की स्तुति करता हूँ, जो यज्ञ के मुख्य पुरोहित हैं, दिव्य प्रकाश से युक्त हैं, यज्ञ का संपादन करते हैं और जो हमें श्रेष्ठ रत्नों तथा सुखों से सुशोभित करने वाले हैं।
4. विस्तृत व्याख्या (Deep Insights)
ऋग्वेद की शुरुआत ‘अग्नि’ शब्द से होती है। यह संयोग नहीं, बल्कि वैदिक दृष्टि का स्पष्ट संकेत है। प्राचीन ऋषियों के लिए अग्नि केवल भौतिक अग्नि नहीं थी, वह चेतना, ऊर्जा और प्रेरक शक्ति का प्रतीक थी।
अग्नि का महत्व: जैसे बिना अग्नि के भोजन नहीं पकता, वैसे ही बिना ज्ञान और चेतना की अग्नि के जीवन में उन्नति संभव नहीं। अग्नि वह शक्ति है जो जड़ को जीवंत बनाती है।
पुरोहित का अर्थ: अग्नि को ‘पुरोहित’ कहा गया है क्योंकि वह सबसे आगे रहकर मार्गदर्शन करती है। जीवन के प्रत्येक यज्ञ में सबसे पहले संकल्प और जागरूकता की अग्नि ही प्रज्वलित होती है।
आज के जीवन में सीख: यह मंत्र हमें सिखाता है कि अपने भीतर की इच्छाशक्ति और संकल्प को जगाना आवश्यक है। जब अंतःकरण में कर्म और ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित होती है, तभी जीवन में सफलता, समृद्धि और आंतरिक रत्न प्राप्त होते हैं।
5. आज की प्रेरणा (Conclusion)
आज अपने दिन की शुरुआत इस संकल्प के साथ करें कि आप अपने भीतर ज्ञान, विवेक और कर्म की अग्नि को कभी बुझने नहीं देंगे। यही अग्नि आपको जीवन के प्रत्येक यज्ञ में पथ प्रदर्शक बनेगी।


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