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भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की कथा: जब स्तम्भ से प्रकट हुए स्वयं नारायण

भक्त प्रह्लाद और भगवान नरसिंह की कथा: जब स्तम्भ से प्रकट हुए स्वयं नारायण

प्रह्लाद और नरसिंह अवतार — अडिग भक्ति की विजय कथा

An artistic depiction of Lord Narasimha emerging from a golden pillar to protect little Prahlad, symbolizing the protection of the righteous

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाने आया हूँ जहाँ एक बालक की अडिग भक्ति ने अत्याचार की दीवारें तोड़ दीं और स्वयं ईश्वर स्तम्भ से प्रकट हो गए। यह कथा है प्रह्लाद की—उस भक्त की, जिसके लिए न भय था, न लोभ, केवल नारायण का नाम था; और यह कथा है उस दिव्य क्षण की, जब भगवान नरसिंह प्रकट हुए।

बहुत प्राचीन समय में असुरराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तप करके ब्रह्मा से वर पाया था कि वह न दिन में मरे, न रात में; न भीतर मरे, न बाहर; न धरती पर मरे, न आकाश में; न मनुष्य के हाथों मरे, न पशु के। वरदान पाते ही उसका अहंकार आकाश छूने लगा। उसने घोषणा कर दी कि अब वही ईश्वर है, और जो विष्णु का नाम लेगा, वह दण्ड पाएगा। उसी के घर में जन्मा उसका पुत्र प्रह्लाद—पर वह पिता के आदेश से नहीं, हृदय की पुकार से चलता था। उसके कंठ में हर समय नारायण का नाम रहता था।

राजमहल में गुरु बदले गए, शिक्षा बदली गई, पर प्रह्लाद नहीं बदला। उससे पूछा गया—“सबसे श्रेष्ठ क्या है?” बालक ने उत्तर दिया—“हरि-स्मरण।” यह सुनकर हिरण्यकशिपु का क्रोध भड़क उठा। उसने प्रह्लाद को विष दिया, पर्वत से गिरवाया, अग्नि में डलवाया, सर्पों के बीच छोड़ा—पर हर बार बालक सुरक्षित रहा। क्योंकि जहाँ शरण सच्ची हो, वहाँ संकट टिक नहीं पाता।

अंततः एक दिन हिरण्यकशिपु ने क्रोध में प्रह्लाद से पूछा—“यदि तेरा विष्णु सर्वत्र है, तो क्या इस स्तम्भ में भी है?” प्रह्लाद ने बिना डरे कहा—“हाँ, प्रभु सर्वत्र हैं।” उसी क्षण स्तम्भ गूँज उठा। न दिन था, न रात; न भीतर था, न बाहर; न भूमि थी, न आकाश—दहलीज़ पर, संध्या के समय, भगवान नरसिंह प्रकट हुए। उनका रूप न मनुष्य था, न पशु—दोनों का संगम। उन्होंने हिरण्यकशिपु को अपनी जाँघों पर रखकर नखों से उसका अंत किया—वरदान की हर सीमा धर्म के साथ पूरी हुई।

क्रोध शांत हुआ तो नरसिंह का नेत्र करुणा से भर आया। प्रह्लाद आगे बढ़ा, भय नहीं—भक्ति के साथ। प्रभु ने उसे वर माँगने को कहा, पर प्रह्लाद ने कहा—“प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए; बस यह कि आपकी भक्ति कभी न छूटे।” ईश्वर मुस्कराए। उन्होंने कहा कि जहाँ ऐसा समर्पण होगा, वहाँ वे स्वयं उपस्थित रहेंगे।

यह कथा हमें सिखाती है कि शक्ति का शोर चाहे जितना ऊँचा हो, भक्ति की मौन धारा उससे ऊँची होती है। अहंकार स्तम्भ बनता है, और सत्य उसी से प्रकट होता है। प्रह्लाद ने दिखाया कि ईश्वर की उपस्थिति सिद्ध करने के लिए तर्क नहीं, निष्ठा चाहिए—और जब निष्ठा पूर्ण होती है, तो ईश्वर स्वयं मार्ग बना लेते हैं।

स्रोत / संदर्भ

यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण (सप्तम स्कंध — प्रह्लाद चरित्र) में विस्तार से वर्णित है; इसके संकेत विष्णु पुराण में भी प्राप्त होते हैं।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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वरदान की काट:

"ब्रह्मा का वरदान असत्य नहीं था, पर हिरण्यकशिपु का अहंकार उसे अमरता समझ बैठा। भगवान ने नरसिंह बनकर दिखाया कि नियम (Law) को तोड़े बिना भी अधर्म का अंत किया जा सकता है। यह 'Higher Intelligence' का प्रमाण है।"


Modern Application:

"प्रह्लाद की तरह बनें—दुनिया चाहे जितना डराए, अपने भीतर के 'नारायण' (सत्य) को न छोड़ें। जब आपकी निष्ठा पूरी होगी, तो आपके लिए भी ईश्वर असंभव से संभव का मार्ग बना देंगे।"



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