सहनशीलता — धर्म का आभूषण
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस गुण की बात करने आया हूँ जिसे कमजोर लोग कमजोरी समझ लेते हैं, और समझदार लोग जीवन का सबसे बड़ा बल मानते हैं — सहनशीलता ही धर्म का आभूषण है। आभूषण शरीर को नहीं, व्यक्तित्व को शोभित करता है; वैसे ही सहनशीलता धर्म को चमकाती है। बिना सहनशीलता के धर्म कठोर हो जाता है, कटु हो जाता है, और अंततः अपने ही उद्देश्य को खो देता है।
सहनशीलता का अर्थ अन्याय सहना नहीं है, न ही अपमान को मौन में निगल जाना। सहनशीलता का अर्थ है — भीतर स्थिर रहकर परिस्थितियों को समझने की क्षमता। यह वह शक्ति है जो मनुष्य को प्रतिक्रिया की जगह विवेक चुनने देती है। जो तुरंत भड़क जाता है, वह कमजोर होता है; जो भीतर आग उठने पर भी संतुलन रख लेता है, वही वास्तव में शक्तिशाली होता है।
सनातन परंपरा ने सहनशीलता को इसलिए महत्त्व दिया क्योंकि जीवन विविधताओं से भरा है। विचार अलग होंगे, स्वभाव अलग होंगे, मार्ग अलग होंगे। यदि मनुष्य हर भिन्नता को शत्रु मान ले, तो जीवन युद्ध बन जाएगा। सहनशीलता भिन्नता को स्वीकार करने की क्षमता देती है — बिना अपने सत्य को छोड़े, बिना दूसरे को कुचले। यही संतुलन धर्म का सौंदर्य है।
सहनशीलता मनुष्य को भीतर से बड़ा बनाती है। जो सहन कर सकता है, वह समझ सकता है। जो समझ सकता है, वही करुणामय हो सकता है। और करुणा के बिना धर्म केवल नियम बनकर रह जाता है। सहनशील व्यक्ति दूसरों की त्रुटियों को देखकर भी तुरंत निर्णय नहीं सुनाता। वह जानता है कि हर मनुष्य किसी न किसी सीख की प्रक्रिया में है। यह दृष्टि उसे कठोर नहीं होने देती।
इतिहास गवाह है कि जब धर्म से सहनशीलता हट गई, तब धर्म हथियार बन गया। विचार संवाद नहीं रहे, टकराव बन गए। सहनशीलता वह सीमा है जो सत्य को भी हिंसक होने से रोकती है। सत्य स्वयं में तीखा हो सकता है, पर सहनशीलता उसे मानवीय बनाती है। बिना सहनशीलता के बोला गया सत्य घाव देता है; सहनशीलता के साथ बोला गया सत्य उपचार करता है।
सहनशीलता केवल दूसरों के लिए नहीं, स्वयं के लिए भी होती है। अपने दोषों को देखने का धैर्य, अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने की क्षमता, और स्वयं को सुधारने की प्रक्रिया में धैर्य रखना — यह भी सहनशीलता है। जो स्वयं से असहिष्णु है, वह दूसरों से कभी सहिष्णु नहीं हो सकता। इसलिए सहनशीलता आत्मचिंतन से शुरू होती है।
प्रकृति स्वयं सहनशीलता का पाठ पढ़ाती है। पृथ्वी बोझ सहती है, नदी गंदगी सहकर भी बहती रहती है, वृक्ष पत्थर खाने के बाद भी फल देते हैं। यह सहनशीलता दुर्बलता नहीं, सृष्टि को चलाने वाली शक्ति है। जो प्रकृति के इस गुण को समझ लेता है, वही धर्म के मर्म को समझ लेता है।
सहनशीलता का अर्थ चुप रहना नहीं, सही समय की प्रतीक्षा करना है। हर बात का उत्तर तुरंत देना आवश्यक नहीं होता। कई बार मौन सबसे गहरी प्रतिक्रिया होता है। सहनशील व्यक्ति जानता है कि समय स्वयं बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। वह अपने सत्य को बचाने के लिए शोर नहीं करता; उसका जीवन ही उसका उत्तर बन जाता है।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को ऊँचा उठाना है, न कि उसे कट्टर बनाना। सहनशीलता ही वह गुण है जो धर्म को उदात्त रखता है। जहाँ सहनशीलता है, वहाँ संवाद है; जहाँ संवाद है, वहाँ समाधान है; और जहाँ समाधान है, वहाँ शांति है। शांति ही धर्म का फल है।
अंततः धर्म का आभूषण वही है जो उसे सुंदर बनाए, भारी नहीं। नियम भारी हो सकते हैं, अहंकार भारी हो सकता है, पर सहनशीलता हल्की होती है, और वही धर्म को चलने योग्य बनाती है।
इसलिए स्मरण रहे —
सहनशीलता कमजोरी नहीं, गहराई है।
सहनशीलता समझौता नहीं, विवेक है।
और सहनशीलता ही धर्म का आभूषण है।
जो इसे धारण कर लेता है, वह धर्म का प्रचार नहीं करता — वह स्वयं धर्म का प्रमाण बन जाता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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