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धर्म बनाम दबाव: क्या धर्म थोपा जा सकता है? सनातन धर्म की उदार दृष्टि

धर्म बनाम दबाव: क्या धर्म थोपा जा सकता है? सनातन धर्म की उदार दृष्टि

धर्म थोपा नहीं जाता — वह भीतर जागता है

A symbolic representation of freedom and spirituality: a bird flying towards a rising sun, leaving behind an open cage, signifying that Dharma is liberation.

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस सत्य को स्मरण कराने आया हूँ जिसे भूलते ही धर्म अपने ही उद्देश्य से भटक जाता है — धर्म किसी पर थोपा नहीं जाता। धर्म आदेश नहीं है, वह बोध है; धर्म दबाव नहीं है, वह जागृति है; धर्म डर से नहीं, समझ से जन्म लेता है। जो थोपा जाए, वह बोझ बनता है; और जो भीतर से स्वीकार किया जाए, वही जीवन बनता है।

सनातन दृष्टि में धर्म का अर्थ किसी नियम-पुस्तक का पालन नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक मर्यादा है। मर्यादा बाहर से लादी नहीं जाती, वह भीतर से उगती है। जैसे फूल को खिलने के लिए खींचा नहीं जाता, वैसे ही धर्म को भी मनुष्य के भीतर पकने दिया जाता है। जब धर्म थोपा जाता है, तब वह प्रतिक्रिया पैदा करता है; और प्रतिक्रिया से जो जन्म लेता है, वह विद्रोह होता है, विवेक नहीं।

धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को स्वतंत्र बनाना है, बंधन में डालना नहीं। जो धर्म भय दिखाकर स्वीकार कराया जाए, वह नैतिकता नहीं पैदा करता, केवल छुपा हुआ असंतोष पैदा करता है। जो धर्म लोभ दिखाकर मनवाया जाए, वह चरित्र नहीं बनाता, केवल दिखावा पैदा करता है। सच्चा धर्म वही है जो व्यक्ति स्वयं चुनता है—क्योंकि उसे उससे शांति मिलती है, संतुलन मिलता है, और जीवन अर्थवान लगता है।

सनातन परंपरा ने इसलिए प्रश्न करने की अनुमति दी, संवाद की परंपरा बनाई, और अनुभव को शास्त्र से ऊपर रखा। यहाँ गुरु भी शिष्य पर कुछ नहीं थोपता; वह केवल संकेत करता है, मार्ग दिखाता है। चलना शिष्य को स्वयं होता है। क्योंकि जो सत्य स्वयं नहीं चला गया, वह कभी अपना नहीं बनता।

धर्म जब थोपा जाता है, तब वह पहचान बन जाता है—“मैं” और “तू”, “हम” और “वे” की रेखाएँ खिंच जाती हैं। पर जब धर्म भीतर से जिया जाता है, तब वह मानवता बन जाता है। भीतर से जिया हुआ धर्म किसी को नीचा नहीं दिखाता, किसी को डराता नहीं, किसी पर अधिकार नहीं जताता। वह केवल यह पूछता है—क्या तुम अपने भीतर के सत्य के प्रति ईमानदार हो? क्या तुम्हारे कर्म करुणा से उपजते हैं?

धर्म को थोपने की कोशिश इसलिए भी विफल होती है क्योंकि हर मनुष्य की यात्रा अलग होती है। किसी का मन भक्ति से खुलता है, किसी का विवेक से, किसी का सेवा से, किसी का संघर्ष से। एक ही मार्ग सब पर थोप देना प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। सनातन ने विविधता को स्वीकार किया, क्योंकि वह जानता है कि सत्य एक है, पर उस तक पहुँचने के रास्ते अनेक हैं।

जो व्यक्ति सच में धार्मिक होता है, उसे धर्म थोपने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसका आचरण ही प्रेरणा बन जाता है। लोग उसके पास इसलिए आते हैं कि उन्हें उसमें शांति दिखती है, करुणा दिखती है, स्थिरता दिखती है। यह आकर्षण किसी प्रचार से नहीं आता, यह जीवन से आता है।

धर्म यदि भीतर से न जिया जाए, तो बाहर का पालन भी खोखला हो जाता है। और जो भीतर से जिया जाए, उसके लिए बाहरी प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं रहती। यही कारण है कि सनातन दृष्टि ने कहा—पहले स्वयं को साधो, फिर संसार अपने आप सध जाएगा।

अंततः धर्म कोई वस्तु नहीं जिसे दिया जाए, वह अनुभव है जिसे जगाया जाता है। उसे जगाने के लिए धैर्य चाहिए, प्रेम चाहिए, और सबसे अधिक—स्वतंत्रता चाहिए। जहाँ स्वतंत्रता है, वहीं सच्चा धर्म फलता है।

इसलिए स्मरण रहे—
धर्म किसी पर थोपा नहीं जाता।
धर्म तब जन्म लेता है, जब मनुष्य स्वयं सत्य को चुन लेता है;
और तब वह चुनाव जीवन को बोझ नहीं, आशीर्वाद बना देता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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