कुरुक्षेत्र के अंतिम क्षण और दुर्योधन की सबसे बड़ी भूल
कुरुक्षेत्र… जहाँ अठारह दिनों तक धरती ने रक्त पिया था, जहाँ आकाश ने विलाप सुना था, और जहाँ धर्म व अधर्म का अंतिम निर्णय हुआ था— आज वही भूमि असहनीय शांति में डूबी थी।
टूटे रथ, गिरे अस्त्र, मृत हाथियों के ढेर और उनके बीच— कुरुवंश का युवराज दुर्योधन, टूटी हुई जंघाओं के साथ मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।
उसी रक्तरंजित भूमि पर जब श्रीकृष्ण आए, तो वातावरण में एक विचित्र कंपन था। दुर्योधन के शरीर में वेदना थी, पर मन में अब भी अहंकार जीवित था।
उसने कृष्ण को देखते ही अपनी पराजय का दोष छल, कपट और पांडवों की नीति पर डाल दिया।
कृष्ण मुस्कराए— वह मुस्कान, जिसमें करुणा भी थी और काल का गूढ़ रहस्य भी।
“दुर्योधन, तुमने अपने काल को पहचाना ही नहीं…”
कृष्ण ने शांत स्वर में कहा— “तुम अपनी हार का कारण दूसरों में खोजते हो, पर सत्य यह है कि तुम स्वयं अपनी पराजय के शिल्पकार हो।”
उन्होंने आगे कहा— “तुम्हारी सेना में एक ऐसा योद्धा था, जो यदि पूर्ण स्वतंत्रता और नेतृत्व पाता, तो पांडवों की पूरी शक्ति व्यर्थ हो जाती। पर तुमने उसे कभी आगे ही नहीं बढ़ाया।”
वह योद्धा था— अश्वत्थामा।
कृष्ण ने दुर्योधन को युद्ध के पूरे प्रवाह को स्मरण कराया—
प्रथम दस दिन— भीष्म पितामह सेनापति रहे। वे अजेय थे, पर पांडवों का वध नहीं करना चाहते थे।
ग्यारहवें से पंद्रहवें दिन— द्रोणाचार्य ने सेना संभाली। उन्होंने पांडवों को गहरी क्षति पहुँचाई, पर पुत्रमोह उनका दुर्बल पक्ष बन गया।
सोलहवाँ दिन— द्रोण के पतन के बाद दुर्योधन ने भावनाओं में बहकर अपने मित्र कर्ण को सेनापति बना दिया।
यहीं सबसे बड़ी भूल हुई।
कृष्ण ने कहा— “दुर्योधन, तुम मित्रता और दानवीरता के मोह में यह भूल गए कि अश्वत्थामा कोई साधारण योद्धा नहीं था।”
वह केवल द्रोण का पुत्र नहीं था— वह रुद्र तत्व से उत्पन्न था। उसके मस्तक पर जन्मजात मणि थी, जो उसे युद्ध में अजेय बनाती थी।
जहाँ कृपाचार्य एक साथ हजारों से युद्ध कर सकते थे, वहीं अश्वत्थामा में अकेले ही असंख्य महारथियों को परास्त करने की सामर्थ्य थी।
उसने केवल अपने पिता से ही नहीं, बल्कि परशुराम, वेदव्यास, भीष्म और दुर्वासा जैसे महापुरुषों से अस्त्र-विद्या प्राप्त की थी।
कृष्ण ने दुर्योधन से कहा—
“यदि सोलहवें दिन तुम कर्ण के स्थान पर अश्वत्थामा को सेनापति बनाते और उसे पूर्ण स्वतंत्रता देते, तो वह अपने रुद्र स्वरूप में प्रकट हो जाता।
तब यह युद्ध अठारह दिन नहीं चलता। दुर्योधन— यह युद्ध एक ही दिन में समाप्त हो जाता।”
पर नियति को कुछ और स्वीकार था।
दुर्योधन ने एक अमर योद्धा की जगह एक मरणशील मित्र को चुना।
जब युद्ध समाप्त हो चुका था और दुर्योधन स्वयं मृत्युशैया पर था, तब उसने अंततः अश्वत्थामा को अंतिम सेनापति घोषित किया।
उस एक ही रात्रि में अश्वत्थामा ने वह कर दिखाया जो पूरी कौरव सेना अठारह दिनों में न कर सकी।
पांडवों के शिविर में प्रवेश, उपपांडवों का वध, धृष्टद्युम्न और शिखंडी का अंत— एक रात में पांडव पक्ष का भविष्य बदल गया।
प्रातः जब यह समाचार दुर्योधन तक पहुँचा, तो उसके चेहरे पर शांति और पश्चाताप दोनों थे।
शांति— क्योंकि शत्रु का वंश नष्ट हो चुका था।
और पश्चाताप— क्योंकि अब उसे समझ आ गया था—
“यदि मैंने यही निर्णय पहले लिया होता, तो आज मैं मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि सिंहासन पर बैठा होता।”
महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है। यह निर्णयों की कथा है।
गलत समय पर लिया गया सही निर्णय भी विनाशकारी हो सकता है, और सही समय पर न लिया गया निर्णय इतिहास बदल देता है।
दुर्योधन की सबसे बड़ी हार युद्ध में नहीं, निर्णय में हुई थी।
जय श्रीकृष्ण। 🙏
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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