सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

The Invisible Throne: How Pure Devotion Compels God to Follow the Devotee

The Invisible Throne: How Pure Devotion Compels God to Follow the Devotee

भक्ति की वह कथा जहाँ भाषा नहीं, भाव बोलता है

A spiritual illustration of Lord Krishna secretly following a devotee's horse, drawn by the power of his sincere and heartfelt singing

यह कथा उस काल की स्मृति है जब भक्ति किसी भाषा की मोहताज नहीं थी, और प्रेम के लिए न तो मज़हब की दीवारें थीं, न ही शब्दों की सीमा। उत्तर भारत के एक नगर में एक सात्विक ब्राह्मण निवास करता था, जो मूलतः पश्चिमोत्तर दिशा से आकर वहाँ बस गया था। जिस हवेली में उसका निवास था, उसी के ऊपरी तल पर एक शाही दरबार से जुड़ा अधिकारी रहता था। दोनों के जीवन अलग थे, संस्कार अलग थे, पर नियति ने उन्हें भक्ति के एक ही सुर से बाँध दिया था।

ब्राह्मण का जीवन नियमों में बँधा था। हर दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करना, दीप जलाना और प्रभु-प्रेम से भरे पदों का गायन करना उसका नित्य कर्म था। उसके कंठ में माधुर्य था और हृदय में ऐसा अनुराग, मानो ईश्वर स्वयं उसमें निवास करते हों। उसी समय ऊपर रहने वाला दरबारी अपनी सरकारी ड्यूटी के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरता, पर जैसे ही वह मधुर गायन उसके कानों में पड़ता, उसके कदम थम जाते। वह वहीं रुककर, बिना भाषा समझे, बिना अर्थ जाने, केवल रस में डूबकर सुनता रहता।

एक दिन उसके मन का बाँध टूट गया। उसने संकोच छोड़कर पूछा कि यह कौन सा गीत है, जिसकी भाषा अनजानी है, पर प्रभाव इतना गहरा कि हृदय को बाँध ले। ब्राह्मण ने सरलता से कहा कि यह प्रेम और भक्ति के पद हैं, जो ईश्वर के मधुर स्वरूप का वर्णन करते हैं। उसने यह भी कहा कि यदि मन में चाह हो, तो इन्हें सीखा जा सकता है। दरबारी ने बिना देर किए स्वीकार कर लिया, क्योंकि जहाँ प्रेम खींच ले, वहाँ पहचान और भेद अपने आप मिट जाते हैं।

समय के साथ वह दरबारी उन कठिन पदों को कंठस्थ करने लगा। उसकी आवाज़ में शास्त्र का ज्ञान नहीं था, पर भाव की सच्चाई थी। एक दिन ब्राह्मण ने उसे बताया कि ये पद केवल गीत नहीं, बल्कि ऐसे भाव-सेतु हैं, जिन पर चलकर प्रभु स्वयं भक्त तक चले आते हैं। उसने समझाया कि जहाँ भी इनका सच्चे मन से गायन होता है, वहाँ प्रभु अदृश्य रूप से उपस्थित हो जाते हैं, इसलिए गाते समय उनके लिए आसन अवश्य रखना चाहिए।

दरबारी ने अपनी विवशता बताई। उसकी नौकरी ऐसी थी कि कभी घर, कभी घोड़े की पीठ, कभी दरबार—कहीं स्थिरता नहीं। ब्राह्मण ने मुस्कुराकर कहा कि भावना ही सबसे बड़ा आसन है। यदि घोड़े पर हो, तो काठी के आगे एक छोटा सा स्थान मन ही मन प्रभु को अर्पित कर देना ही पर्याप्त है।

उस दिन के बाद, वह जहाँ भी गाता, प्रभु के लिए स्थान अवश्य रखता। पर एक दिन अचानक शाही बुलावा आया। ऐसी हड़बड़ी थी कि वह बिना रुके घोड़े पर चढ़ गया। उस क्षण वह प्रभु के लिए आसन रखना भूल गया। रास्ते में जाते-जाते उसके होंठों से फिर वही पद निकलने लगे। वह गाने में लीन हो गया।

तभी उसे लगा कि घोड़े की टापों के साथ किसी और के पाँवों की मधुर ध्वनि मिल रही है, जैसे नूपुरों की झंकार। पहले उसने इसे भ्रम समझा, पर जब वह लय में बदल गई, तो उसने घोड़ा रोक दिया। पीछे मुड़कर देखा तो उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई। आँखों से अश्रु बहने लगे।

वहाँ स्वयं श्यामसुंदर खड़े थे—मुस्कान वही, रूप वही, मानो भक्त के प्रेम ने उन्हें खींच लिया हो। उन्होंने स्नेह से पूछा कि गायन क्यों रुक गया। कांपती आवाज़ में दरबारी ने पूछा कि क्या सचमुच प्रभु उसके पीछे चलते आए हैं। उत्तर मिला—न चलना, न दौड़ना, बल्कि नाचते हुए आना। भाव की डोर ने उन्हें बाँध रखा था, आसन का अभाव उन्हें रोक नहीं सका।

उस क्षण दरबारी का जीवन बदल गया। उसे समझ आ गया कि जिस नौकरी के पीछे वह भाग रहा था, वह उस प्रेम के सामने कुछ भी नहीं, जिसके लिए स्वयं ईश्वर नंगे पाँव चल पड़ें। उसने उसी समय अपने सांसारिक बंधन त्याग दिए और भक्ति का मार्ग अपना लिया। आगे चलकर उसका जीवन सेवा और साधना में बीता, और वह प्रेम के उस रस का साक्षी बन गया, जो न भाषा देखता है, न पहचान—केवल हृदय देखता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


🙏 Support Us / Donate Us

हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।

Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak



टिप्पणियाँ