मैं गर्व से कहता हूँ — मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म उपवास को भूख नहीं, आत्मसंयम मानता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं आपको सनातन धर्म की उस परंपरा के बारे में बहुत आसान शब्दों में बताना चाहता हूँ जिसे कई लोग सिर्फ भूखा रहने का नाम समझ लेते हैं—उपवास।
सनातन धर्म में उपवास का मतलब पेट को कष्ट देना नहीं है। उपवास का असली अर्थ है—इंद्रियों पर नियंत्रण और मन को शांत करना। इसलिए इसे “उप-वास” कहा गया—यानी अपने भीतर के ईश्वर के पास रहना।
जब हम उपवास रखते हैं, तो हमारा शरीर हल्का होता है और मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है। भोजन कम होने से सोच साफ होती है, क्रोध कम होता है, और भीतर एक स्थिरता आती है। यही कारण है कि हमारे धर्म में उपवास को शुद्धि का माध्यम माना गया है।
सनातन धर्म यह भी सिखाता है कि हर इच्छा को तुरंत पूरा करना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी रुकना, संयम रखना, और खुद पर नियंत्रण रखना मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है। उपवास इसी अभ्यास का नाम है।
यह परंपरा किसी पर थोप दी गई नहीं है। यह एक विकल्प है—जो करना चाहे, वह अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार करे। यही सनातन की सुंदरता है—यह मजबूरी नहीं, समझ सिखाता है।
मैं तु ना रिं आपसे यही कहना चाहता हूँ—अगर आप कभी उपवास रखें, तो उसे दिखावे के लिए नहीं, शांति के लिए रखें। और अगर न भी रखें, तो संयम और संतुलन अपने जीवन में ज़रूर लाएँ। क्योंकि वही उपवास का सार है।
और इसी गहरी समझ के कारण मैं गर्व से कहता हूँ—“हाँ, मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि सच्चा उपवास पेट का नहीं, मन का होता है।”
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