महर्षि भारद्वाज
महर्षि भारद्वाज सनातन परंपरा के महान वैदिक ऋषि माने जाते हैं। उन्हें हिंदू धर्म में अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है और उनका जीवन वेद, ज्ञान और साधना को समर्पित रहा।
पहचान / भूमिका
वे एक महान हिंदू ऋषि थे, जिनका स्थान वैदिक ऋषि परंपरा में अत्यंत प्रतिष्ठित है।
प्रसिद्धि का आधार
महर्षि भारद्वाज को हिंदू ग्रंथों, वैदिक मंत्रों तथा अनेक शास्त्रीय परंपराओं से जोड़ा जाता है। उन्हें वेद-द्रष्टा ऋषियों में गिना जाता है और विभिन्न विद्याओं के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है।
धार्मिक परंपरा
हिंदू (सनातन धर्म)
परिवार / वंश
पिता: देवगुरु बृहस्पति
माता: ममता
संतान: द्रोण (प्रसिद्ध पुत्र, महाभारत काल के महान आचार्य), गर्ग, इलविदा, कात्यायनी
महर्षि भारद्वाज का वंश, ज्ञान और तप केवल उनके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी संतानों और शिष्यों के माध्यम से भारतीय इतिहास, धर्म और संस्कृति की धारा को युगों तक प्रभावित करता रहा।
महर्षि भारद्वाज प्राचीन भारत के उन विराट ऋषियों में गिने जाते हैं, जिनका योगदान केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने विज्ञान, चिकित्सा, भाषा, राजनीति और राज्यव्यवस्था तक भारतीय चेतना को दिशा दी। आयुर्वेद परंपरा में उन्हें अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने स्वयं इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया और उसी ज्ञान को आगे मानव समाज के कल्याण हेतु प्रवाहित किया।
व्याकरण परंपरा में भी उनका स्थान विशिष्ट है। ऋक्तंत्र और प्राक्तंत्र की परंपरा के अनुसार ब्रह्मा, बृहस्पति और इन्द्र के पश्चात वे चौथे महान व्याकरण-प्रवक्ता माने गए हैं। कहा जाता है कि व्याकरण का यह गूढ़ ज्ञान भी उन्होंने इन्द्र से ही प्राप्त किया, जबकि धर्मशास्त्र का उपदेश उन्हें महर्षि भृगु से मिला।
रामायण काल में उनका नाम एक सजीव साक्षी के रूप में आता है। तमसा नदी के तट पर क्रौंचवध की वह करुण घटना, जिसने महर्षि वाल्मीकि के हृदय से आदिकाव्य को जन्म दिया, उस समय ऋषि भारद्वाज भी वहाँ उपस्थित थे। वाल्मीकि रामायण की परंपरा में उन्हें महर्षि वाल्मीकि का शिष्य भी माना गया है।
महर्षि भारद्वाज बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। व्याकरण, आयुर्वेद संहिता, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, यंत्रविज्ञान, पुराण और शिक्षा—इन सभी विषयों पर उन्होंने ग्रंथों की रचना की। यद्यपि काल के प्रवाह में अधिकांश ग्रंथ लुप्त हो गए, फिर भी यंत्र-सर्वस्व और शिक्षा से संबंधित ग्रंथ आज भी उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण की साक्षी देते हैं।
वायु पुराण में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने आयुर्वेद संहिता की रचना कर उसे आठ भागों में विभाजित किया और अपने शिष्यों को उसका विधिवत् उपदेश दिया। चरक संहिता में वर्णित है कि कायचिकित्सा का ज्ञान उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को प्रदान किया, जिससे आगे चलकर आयुर्वेद की सुदृढ़ परंपरा विकसित हुई।
प्रयाग को ऋषि भारद्वाज का विशेष क्षेत्र माना जाता है। परंपरा के अनुसार वे ही प्रयाग के प्रथम निवासी और संस्थापक माने गए हैं। यहीं उन्होंने धरती के प्राचीनतम और विशाल गुरुकुल की स्थापना की, जहाँ हजारों वर्षों तक ज्ञान का अखंड दान होता रहा।
वे केवल ऋषि नहीं, बल्कि शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र के मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या के विशेषज्ञ, अभियंत्रिकी के ज्ञाता, विज्ञानवेत्ता और मंत्र-द्रष्टा थे। ऋग्वेद के छठे मंडल के द्रष्टा ऋषि भी वही हैं, जिसमें सैकड़ों मंत्र समाहित हैं, और अथर्ववेद में भी उनके मंत्रों का उल्लेख मिलता है।
आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि-विद्या का ज्ञान उन्हें पहले इन्द्र से और बाद में स्वयं ब्रह्मा से प्राप्त हुआ, ऐसा तैत्तिरीय ब्राह्मण में संकेत मिलता है। अग्नि-तत्व के गहन साधन से उन्होंने अमृत-तत्त्व को आत्मसात किया और आदित्य के सायुज्य का वर्णन भी ग्रंथों में आता है।
चरक ऋषि ने उन्हें अपरिमित आयु वाला कहा है, जो उनकी तपशक्ति और साधना का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
प्रयाग के अधिष्ठाता देव श्री माधव—जो साक्षात् श्रीहरि माने जाते हैं—की द्वादश माधव परिक्रमा की परंपरा भी ऋषि भारद्वाज से जुड़ी है। यह परिक्रमा भगवान शिव के आशीर्वाद से स्थापित मानी जाती है और इसे संसार की प्राचीनतम परिक्रमाओं में गिना जाता है।
आयुर्वेद संहिता, भारद्वाज स्मृति, भारद्वाज संहिता, राजशास्त्र और यंत्र-सर्वस्व जैसे ग्रंथ उनके नाम से जुड़े हैं, जो उनकी बहुविध प्रतिभा का प्रमाण हैं। सामाजिक परंपराओं में वे खाण्डल विप्र समाज के अग्रज माने जाते हैं।
उनके उपदेशों में अग्नि को मानव के भीतर स्थित अमर ज्योति कहा गया है—जो मनुष्य को ऊपर उठने की प्रेरणा देती है और आत्मपहचान की ओर ले जाती है। उत्तराखंड सहित भारत के अनेक क्षेत्रों में भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण, क्षत्रिय और अन्य समुदाय उनकी वंशपरंपरा से स्वयं को जोड़ते हैं।
महर्षि भारद्वाज केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक व्यक्तित्व नहीं हैं, वे उस सनातन दृष्टि के प्रतीक हैं जिसमें ज्ञान, विज्ञान, धर्म और समाज एक-दूसरे से पृथक नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
🙏 Support Us / Donate Us
हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।
Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें