सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अहिंसा परमो धर्मः — क्यों यह सनातन धर्म का हृदय है, कमजोरी नहीं

अहिंसा परमो धर्मः — क्यों यह सनातन धर्म का हृदय है, कमजोरी नहीं

अहिंसा परमो धर्मः — सनातन का हृदय

Ahimsa Paramo Dharma meaning – non violence as inner strength in Sanatan Dharma

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस वाक्य के मर्म को खोलने आया हूँ जिसे अक्सर केवल नारे की तरह दोहरा दिया जाता है, पर जिसका अर्थ जीवन की जड़ों तक जाता है — “अहिंसा परमो धर्मः”। यह कोई भावुक आदर्श नहीं, कोई कमजोरी का उपदेश नहीं, और न ही केवल शारीरिक हिंसा से बचने की बात है। अहिंसा सनातन धर्म का हृदय है, उसकी आत्मा है, उसका सबसे सूक्ष्म और सबसे ऊँचा सत्य है।

अहिंसा का अर्थ केवल किसी को मारना नहीं है। हिंसा शब्दों से भी होती है, दृष्टि से भी होती है, उपेक्षा से भी होती है, और सबसे अधिक—विचारों से होती है। जब मनुष्य किसी के लिए घृणा पालता है, किसी को तुच्छ समझता है, किसी के दुख से उदासीन रहता है—तब वह हिंसा ही कर रहा होता है, भले ही उसके हाथ शांत हों। अहिंसा का अर्थ है—किसी भी स्तर पर किसी के अस्तित्व को आघात न पहुँचाना। न शरीर से, न मन से, न वाणी से।

सनातन दृष्टि कहती है कि हर प्राणी में वही आत्मा है। जब यह बोध गहरा हो जाता है, तब अहिंसा स्वाभाविक बन जाती है। क्योंकि तब सामने वाला “दूसरा” नहीं रहता। तब जिसे कष्ट पहुँचता है, वही आत्मा है जो मेरे भीतर है। अहिंसा कोई नियम नहीं रह जाती, वह अनुभूति बन जाती है। और अनुभूति से उपजा आचरण ही धर्म होता है।

अहिंसा कायरता नहीं है। यह सबसे बड़ा साहस है। हिंसा करने के लिए आवेग चाहिए, अहिंसा के लिए विवेक। हिंसा में मनुष्य स्वयं को सही ठहराता है, अहिंसा में वह स्वयं को साधता है। जो व्यक्ति क्रोध में किसी को चोट नहीं पहुँचाता, वह दुर्बल नहीं, वह भीतर से अत्यंत शक्तिशाली होता है। क्योंकि उसने अपने ऊपर विजय पाई है। और जिसने अपने ऊपर विजय पा ली, उसके लिए संसार में कोई शत्रु शेष नहीं रहता।

यह भी समझना आवश्यक है कि अहिंसा अन्याय के सामने चुप रहना नहीं है। सनातन धर्म ने कभी निष्क्रियता का समर्थन नहीं किया। अहिंसा का अर्थ है—अन्याय का प्रतिकार बिना द्वेष के, बिना प्रतिशोध के, और बिना आत्मा को कलुषित किए करना। जब प्रतिकार धर्म से होता है, तब वह हिंसा नहीं रहता। जब प्रतिकार अहंकार से होता है, तब वह अधर्म बन जाता है। यही सूक्ष्म भेद अहिंसा का मर्म है।

अहिंसा केवल सामाजिक आचरण नहीं, यह आध्यात्मिक साधना है। जब मनुष्य किसी को क्षमा करता है, तब वह दूसरे को नहीं, स्वयं को मुक्त करता है। घृणा मन को बाँधती है, अहिंसा मन को खोलती है। जहाँ मन खुलता है, वहीं करुणा प्रवाहित होती है। और करुणा वही भूमि है जहाँ धर्म फलता-फूलता है।

प्रकृति स्वयं अहिंसा का उपदेश है। वृक्ष पत्थर फेंकने वाले को भी छाया देता है। नदी सबको जल देती है, किसी से पहचान नहीं पूछती। पृथ्वी सबका भार सहती है, शिकायत नहीं करती। यह सब कोई कमजोरी नहीं है—यह संतुलन है। प्रकृति हिंसा से नहीं, समन्वय से चलती है। और मनुष्य यदि स्वयं को प्रकृति का अंश मानता है, तो उसका धर्म भी समन्वय ही होगा।

अहिंसा का अभ्यास बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है। जब मनुष्य अपने ही मन में उठने वाली कठोरता को देखता है और उसे ढीला करता है, तब अहिंसा का जन्म होता है। जब वह अपनी अपेक्षाओं को पहचानता है और उन्हें संयम में लाता है, तब अहिंसा स्थिर होती है। जब वह अपने शब्दों को सजगता से चुनता है, तब अहिंसा वाणी बनती है। यही आंतरिक साधना अहिंसा को जीवित रखती है।

अहिंसा परमो धर्मः इसलिए कहा गया, क्योंकि यह सभी धर्मों का आधार है। बिना अहिंसा के सत्य कठोर हो जाता है, बिना अहिंसा के न्याय प्रतिशोध बन जाता है, बिना अहिंसा के साधना अहंकार को पोषित करती है। अहिंसा सबको शुद्ध करती है—कर्म को, ज्ञान को, भक्ति को। यह धर्म का मर्म इसलिए है क्योंकि यही वह तत्व है जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखता है।

जब अहिंसा जीवन में उतरती है, तब रिश्ते बदलते हैं, समाज बदलता है, और अंततः स्वयं मनुष्य बदलता है। वह अधिक सुनता है, कम ठहराता है; अधिक समझता है, कम आक्रमण करता है; अधिक जोड़ता है, कम तोड़ता है। यह परिवर्तन किसी आदेश से नहीं आता, यह बोध से आता है। और बोध ही सनातन की विधि है।

अंततः अहिंसा कोई लक्ष्य नहीं, यात्रा है—हर दिन की, हर क्षण की। यह पूर्णता का दावा नहीं कराती, बल्कि निरंतर सजगता सिखाती है। जहाँ सजगता है, वहीं धर्म जीवित है।

इसीलिए स्मरण रहे—
अहिंसा कोई विकल्प नहीं, धर्म का मर्म है।
जो इसे समझ लेता है, वह दूसरों से नहीं लड़ता;
और जो इसे जी लेता है, वह स्वयं से भी नहीं लड़ता—
वह शांति में स्थित हो जाता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


🙏 Support Us / Donate Us

हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।

Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak



टिप्पणियाँ