🔥 सनातन धर्म ने मुझे भीतर से कैसे बदला? 🔥
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। यह लेख कोई उपदेश नहीं है। यह कोई ज्ञान-प्रदर्शन नहीं है। यह स्वीकारोक्ति है — एक ऐसे युवा की, जो बाहर से ठीक दिखता था और भीतर से धीरे-धीरे टूट रहा था।
मैं भी उसी दौड़ में था जिसे आज “success” कहा जाता है। काम, नाम, दिखावा, तुलना। दिन भर strong दिखना, और रात को खुद से भागना।
मैं गुस्से में था, पर जानता नहीं था क्यों। मैं चिड़चिड़ा था, पर कारण नहीं समझता था। मेरे पास जवाब थे, पर शांति नहीं थी।
और सच बताऊँ— मैं भी उन लोगों में था जो सनातन को “later देखेंगे” की लिस्ट में रखते हैं।
फिर एक दिन कुछ टूटा। बाहर नहीं— अंदर।
जब सवाल आया— “सब कुछ होते हुए भी मैं खाली क्यों हूँ?”
यहीं से सनातन शुरू हुआ।
किसी मंदिर से नहीं। किसी प्रवचन से नहीं। किसी चमत्कार से नहीं।
बस एक वाक्य से— भगवद्गीता का।
“तुम कर्म के अधिकारी हो, फल के नहीं।”
उस दिन पहली बार समझ आया— मैं जीतने के लिए नहीं, भागने के लिए जी रहा था।
सनातन ने मुझे कमज़ोर नहीं बनाया। उसने मुझे ईमानदार बनाया।
ईमानदार अपने डर के साथ। ईमानदार अपनी सीमाओं के साथ। ईमानदार अपने अहंकार के साथ।
मैंने सीखा कि हर गुस्सा दूसरे की गलती नहीं होता। हर दुख किसी और की वजह नहीं होता।
कुछ लड़ाइयाँ भीतर होती हैं। और उन्हें जीतने के लिए दुश्मन नहीं, दृष्टि चाहिए।
सनातन ने मेरी speed कम नहीं की। उसने मेरी दिशा बदली।
अब मैं कम दौड़ता हूँ, पर सही दिशा में।
अब मैं कम बोलता हूँ, पर सच बोलता हूँ।
अब मुझे हर बहस जीतनी नहीं होती, क्योंकि अब मुझे खुद से हारना बंद हो गया है।
यह धर्म तुमसे सब कुछ छोड़ने को नहीं कहता। यह तुमसे झूठ छोड़ने को कहता है।
यह धर्म तुम्हें संत नहीं बनाता। यह तुम्हें स्थिर बनाता है।
और स्थिर इंसान आज की दुनिया में सबसे खतरनाक होता है।
क्योंकि वह डर से नहीं चलता। भीड़ से नहीं बहता। ट्रेंड से नहीं बिकता।
यह लेख मेरी कहानी है। लेकिन अगर इसे पढ़ते हुए तुम्हें लगा “यह तो मेरी बात है”— तो समझो सनातन तुम्हें भी धीरे-धीरे बुला रहा है।
शोर से नहीं। डर से नहीं। बस सच्चाई से।
🕉️ मैं हिन्दू हूँ। क्योंकि सनातन ने मुझे दुनिया से नहीं, खुद से जोड़ा।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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