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👉 Click Hereभोजन सनातन का पहला योग
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस विषय पर ले चल रहा हूँ जिसे लोग केवल पेट से जोड़ते हैं, पर सनातन उसे चित्त और चेतना से जोड़ता है भोजन। सनातन धर्म कहता है जैसा अन्न वैसा मन। यह कोई कहावत नहीं, यह मानव मन का विज्ञान है। ऋषियों ने देखा कि जो खाया जाता है वही मन बन जाता है।
भारी भोजन भारी सोच पैदा करता है। उग्र भोजन उग्र मन पैदा करता है। इसी कारण सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तीन प्रकार के आहार बताए गए। सात्त्विक भोजन मन को शुद्ध करता है जैसे फल, दूध, अन्न और सादगी। राजसिक भोजन मन को उत्तेजित करता है जैसे तीखा, खट्टा और अत्यधिक मसालेदार। तामसिक भोजन मन को जड़ बनाता है जैसे बासी, नशीला और हिंसात्मक।
सनातन में भोजन केवल पकाया नहीं जाता, पूजा जाता है। इसलिए कहा गया है अन्नं ब्रह्म। जिस भोजन में कृतज्ञता नहीं होती, वह शरीर भर सकता है पर मन नहीं।
घर में पकता भोजन, माँ के हाथ का अन्न और यज्ञ से निकला प्रसाद इनमें केवल स्वाद नहीं, संस्कार होता है। आज लोग खाते समय टीवी देखते हैं, फोन देखते हैं और मन कहीं और होता है, फिर कहते हैं मन अशांत क्यों है।
सनातन कहता है खाते समय सिर्फ खाओ, कृतज्ञ रहो, शांत रहो। क्योंकि भोजन केवल पेट में नहीं जाता, वह चित्त में उतरता है। और जिस चित्त में अशांति भरी हो, वहाँ ध्यान टिकता नहीं।
इसलिए ऋषियों ने कहा यदि योग चाहते हो, तो थाली से शुरू करो।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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