महर्षि भृगु की सम्पूर्ण कथा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस महामहर्षि की कथा सुनाने आया हूँ जिनकी दृष्टि ने देवताओं की भी परीक्षा ली, जिनके निर्णय में भय नहीं था, और जिनकी साधना ने कर्म, भाग्य और समय—तीनों के संबंध को स्पष्ट किया; जिनके वंश से ऋषि, भृगुवंशी आचार्य और आचार-संहिता निकली—आज मैं तुम्हें महर्षि भृगु की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में।
महर्षि भृगु का जन्म ब्रह्मा की मानस-संतान परम्परा में माना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्मा के तप और संकल्प से वे प्रकट हुए—ऐसे तेज के साथ जो प्रश्न पूछने से नहीं डरता था। बाल्यकाल से ही भृगु का स्वभाव निर्भीक और जिज्ञासु था। वे वेदों का अध्ययन करते, पर किसी भी सत्य को केवल परम्परा के आधार पर स्वीकार नहीं करते थे। उनका आग्रह था कि जो धर्म कहा जाए, वह जीवन में टिके; जो देव कहा जाए, वह करुणा में खरा उतरे; और जो ज्ञान दिया जाए, वह समय की कसौटी पर खरा साबित हो।
भृगु की साधना अरण्यों में हुई। उनका तप शरीर को कष्ट देने का अभ्यास नहीं था, बल्कि विवेक को धार देने की प्रक्रिया थी। वे कहते थे कि अंध-श्रद्धा भी अज्ञान का ही एक रूप है, और धर्म का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि साहस जगाना है। उनके आश्रम में शिष्य प्रश्न पूछते थे, बहस करते थे और सत्य तक पहुँचते थे, क्योंकि भृगु के लिए असहमति अपवित्र नहीं थी, असत्य पर अड़े रहना अपवित्र था।
उनकी कथा का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग त्रिदेव-परीक्षा है। जब यह प्रश्न उठा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव में से कौन सृष्टि-धर्म का सर्वोत्तम वहन करता है, तब निर्णय के लिए भृगु को चुना गया। उन्होंने ब्रह्मा में सृजन का गर्व देखा, शिव में तप की तीव्रता देखी, और विष्णु में क्षमा, करुणा और संतुलन पाया। भृगु ने विष्णु की छाती पर पैर रखा—परीक्षा के लिए—और विष्णु ने उसे क्रोध से नहीं, विनय से स्वीकार किया। उसी क्षण भृगु ने जाना कि जो सत्ता अपनी शक्ति के बावजूद क्षमा को चुन ले, वही धर्म का केंद्र है।
भृगु का गृहस्थ जीवन भी साधना का विस्तार था। उनका विवाह ख्याति से हुआ और उनके वंश में ऐसे आचार्य उत्पन्न हुए जिन्होंने समाज-व्यवस्था, धर्मसूत्र और आचार-संहिता को आकार दिया। भृगु कहते थे कि भाग्य कोई स्थिर रेखा नहीं, बल्कि कर्म से बनती धारा है। इसी चिंतन से भृगु-संहिता की परम्परा मानी जाती है, जिसमें जन्म, कर्म और संभावनाओं का अध्ययन किया गया।
रामायण और पुराणों में भृगु का प्रभाव अनेक स्थानों पर दिखाई देता है। वे राजाओं को भी निर्भीक होकर सत्य कहते थे। वे मानते थे कि सत्य का पहला गुण यही है कि वह सुविधा से ऊपर होता है। करुणा और न्याय को वे अलग नहीं करते थे। पश्चाताप करने वाले को अवसर और अहंकार में अड़े रहने वाले को चेतावनी देना—यही उनका संतुलन था।
भृगु की साधना ने यह सिखाया कि धर्म जड़ नहीं होता। समय और परिस्थितियों के साथ उसकी अभिव्यक्ति बदलती है, पर सत्य, करुणा और संयम स्थिर रहते हैं। उन्होंने कर्मकांड को विवेक से और विवेक को करुणा से जोड़ा। इसी कारण उनका प्रभाव ऋषियों तक सीमित न रहकर समाज के हर स्तर तक पहुँचा।
अंतिम काल में भृगु अधिक मौनप्रिय हो गए। एक संध्या वे नदी-तट पर ध्यानस्थ हुए। श्वास सूक्ष्म थी, मन निर्मल था और चेतना व्यापक। प्रभात से पहले वह मौन और गहरा हुआ और भृगु देह-सीमा से परे ब्रह्म-चेतना में विलीन हो गए, बिना किसी घोषणा के, जैसे सत्य स्वयं में विश्राम कर ले।
महर्षि भृगु का संदेश आज भी जीवित है—प्रश्न करने का साहस रखो, उत्तर पाने का धैर्य रखो, और शक्ति के सामने भी करुणा को मत छोड़ो। यही धर्म की सच्ची कसौटी है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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