सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

माता-पिता की सेवा ही सच्चा तीर्थ है: सनातन धर्म की सबसे बड़ी साधना।

माता-पिता की सेवा ही सच्चा तीर्थ है: सनातन धर्म की सबसे बड़ी साधना।

माता-पिता की सेवा ही सच्चा तीर्थ है

A symbolic artistic image showing a person bowing at the feet of their elderly parents, with the faint reflection of a holy temple in the background.

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं उस सत्य की बात करने आया हूँ जिसे मनुष्य दूर-दूर खोजता है, पर्वतों पर चढ़ता है, नदियों में स्नान करता है, पर जो उसके अपने घर के आँगन में ही प्रतिदिन उपस्थित रहता है। माता-पिता की सेवा ही सच्चा तीर्थ है। यह कोई भावनात्मक कथन नहीं, न ही केवल नैतिक उपदेश; यह सनातन जीवन-दृष्टि का सार है। तीर्थ का अर्थ केवल स्थान नहीं, बल्कि वह स्थिति है जहाँ हृदय शुद्ध हो, अहंकार झुके और कृतज्ञता जागे। यह स्थिति सबसे सहज रूप से माता-पिता की सेवा में प्रकट होती है।

माता-पिता हमारे जीवन के पहले देवता हैं, क्योंकि उन्होंने हमें बिना शर्त स्वीकार किया। जब हम बोलना नहीं जानते थे, तब उन्होंने हमारी पीड़ा समझी; जब हम चलना नहीं जानते थे, तब उन्होंने हमें गिरने से पहले थाम लिया; और जब हम संसार को नहीं जानते थे, तब उन्होंने हमें संसार के लिए तैयार किया। इस समर्पण में कोई अपेक्षा नहीं थी, कोई लेन-देन नहीं था। यही निष्काम भाव तीर्थ की पहचान है। जहाँ निष्कामता है, वहीं पवित्रता है।

तीर्थ पर जाकर मनुष्य स्नान करता है ताकि पाप धुल जाएँ, पर माता-पिता की सेवा में मनुष्य का अहंकार धुलता है, और अहंकार का धुलना ही सबसे बड़ा स्नान है। जल शरीर को शीतल करता है, सेवा मन को शुद्ध करती है। जल क्षणिक शांति देता है, सेवा स्थायी संतोष देती है। इसलिए सनातन परंपरा ने कहा कि यदि माता-पिता प्रसन्न हैं, तो सभी देवता प्रसन्न हैं; और यदि माता-पिता दुखी हैं, तो सारे तीर्थ भी निष्फल हो जाते हैं।

माता-पिता की सेवा का अर्थ केवल उनकी आवश्यकताएँ पूरी करना नहीं है। सेवा का अर्थ है सम्मान, धैर्य, समय और समझ। उनकी बातों को सुनना, उनके अनुभवों का आदर करना, उनके भय को समझना और उनकी कमजोरियों को स्वीकार करना। जब वे वृद्ध होते हैं, तब वे बच्चे बन जाते हैं, और तब वही अवसर आता है जब संतान अपने संस्कारों की परीक्षा देती है। यही परीक्षा तीर्थ से बड़ी है, क्योंकि यहाँ कोई देखने वाला नहीं होता, केवल अंतरात्मा साक्षी होती है।

अक्सर मनुष्य कहता है कि उसके पास समय नहीं है, पर यह समय की कमी नहीं, प्राथमिकताओं का भ्रम है। जो व्यक्ति माता-पिता के लिए समय निकाल लेता है, वह जीवन के लिए सही समय निकालना सीख लेता है। और जो यहाँ असफल हो जाता है, वह बड़े-बड़े व्रत, दान और यात्राओं के बाद भी भीतर खाली रह जाता है। क्योंकि धर्म बाहर से नहीं, भीतर से फलता है।

माता-पिता की सेवा में कोई प्रदर्शन नहीं होता। वहाँ कैमरे नहीं होते, प्रशंसा नहीं होती, तालियाँ नहीं होतीं। यही कारण है कि यह सेवा कठिन है और इसी कारण यह श्रेष्ठ है। जहाँ प्रशंसा का अभाव हो और फिर भी कर्म किया जाए, वहीं सच्ची साधना होती है। यही सेवा मनुष्य को विनम्र बनाती है, उसकी कृतज्ञता को गहरा करती है और उसके जीवन को संतुलित करती है।

यह भी समझना आवश्यक है कि माता-पिता पूर्ण नहीं होते। उनसे भूलें होती हैं, उनसे कठोरता भी होती है। पर सेवा का अर्थ यह नहीं कि हम उनकी हर भूल को सही ठहराएँ, बल्कि उनके सीमित मनुष्य होने को स्वीकार करना है। जब संतान यह स्वीकार कर लेती है, तब उसके भीतर क्षमा का जन्म होता है। और क्षमा वही तीर्थ है जहाँ मन हल्का होता है।

सनातन धर्म ने कभी तीर्थों का निषेध नहीं किया, पर उसने प्राथमिकता सिखाई। उसने कहा पहले घर का तीर्थ, फिर बाहर का। क्योंकि जो व्यक्ति घर में कर्तव्य से भागता है, वह बाहर जाकर भी धर्म नहीं पा सकता। और जो व्यक्ति घर में धर्म जी लेता है, उसके लिए हर स्थान तीर्थ बन जाता है।

माता-पिता की सेवा समाज को भी जोड़ती है। जहाँ यह सेवा जीवित रहती है, वहाँ संस्कार जीवित रहते हैं, पीढ़ियाँ जुड़ी रहती हैं और जीवन की निरंतरता सुरक्षित रहती है। जहाँ यह सेवा टूटती है, वहाँ अकेलापन बढ़ता है, कटुता बढ़ती है और सभ्यता भीतर से खोखली हो जाती है। इसलिए यह केवल व्यक्तिगत धर्म नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।

अंततः तीर्थ का उद्देश्य यही है कि मनुष्य कुछ समय के लिए सही दिशा में खड़ा हो जाए। माता-पिता की सेवा उस दिशा को जीवनभर के लिए स्थिर कर देती है। वहाँ रोज़ अवसर मिलता है अपने स्वार्थ को छोड़ने का, अपने क्रोध को साधने का और अपने प्रेम को कर्म में उतारने का। यही निरंतरता मनुष्य को महान बनाती है।

इसलिए स्मरण रहे। तीर्थ पर जाना पुण्य है, पर माता-पिता के पास रुकना धर्म है। तीर्थ यात्रा समाप्त हो जाती है, पर सेवा की यात्रा जीवन भर चलती है। माता-पिता की सेवा ही सच्चा तीर्थ है। जो इसे समझ लेता है, उसके लिए धर्म दूर नहीं रहता; और जो इसे जी लेता है, उसके लिए जीवन स्वयं तीर्थ बन जाता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


🙏 Support Us / Donate Us

हम सनातन ज्ञान, धर्म–संस्कृति और आध्यात्मिकता को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आपको हमारा कार्य उपयोगी लगता है, तो कृपया सेवा हेतु सहयोग करें। आपका प्रत्येक योगदान हमें और बेहतर कंटेंट बनाने की शक्ति देता है।

Donate Now
UPI ID: ssdd@kotak



टिप्पणियाँ