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लोकसंग्रह: क्या है धर्म का असली सार? क्यों केवल अपने लिए जीना अधर्म है

लोकसंग्रह: क्या है धर्म का असली सार? क्यों केवल अपने लिए जीना अधर्म है।

धर्म का सार है “लोकसंग्रह” — सबका भला

A banyan tree providing shade to various people and animals, symbolizing Lokasamgraha—the act of holding society together with selfless service

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस गहरे सनातन सत्य को शब्द देने आया हूँ जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में जीवन का मूल बताया — धर्म का सार है “लोकसंग्रह”, अर्थात् सबका भला। यह वाक्य केवल सामाजिक आदर्श नहीं, यह ब्रह्मांडीय नियम है। जो व्यक्ति केवल अपने लिए जीता है, वह भीतर से छोटा होता जाता है; और जो सबके लिए जीता है, वही सच में बड़ा होता है। सनातन धर्म का लक्ष्य किसी एक व्यक्ति, जाति या वर्ग का नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि का कल्याण है।

लोकसंग्रह का अर्थ है — समाज को जोड़कर रखना, जीवन को संतुलन में बनाए रखना, और हर प्राणी के लिए स्थान सुरक्षित करना। यह केवल दया नहीं है, यह व्यवस्था है। जिस प्रकार शरीर में हर अंग एक-दूसरे के लिए काम करता है, उसी प्रकार समाज में हर व्यक्ति का धर्म है कि वह अपने कर्म से पूरे समाज के स्वास्थ्य में योगदान दे। जब कोई अंग केवल अपने लिए काम करने लगे, तो शरीर रोगी हो जाता है। जब कोई व्यक्ति केवल अपने लिए जीने लगे, तो समाज विकृत हो जाता है। लोकसंग्रह उस विकृति का उपचार है।

सनातन परंपरा में धर्म को कभी व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं किया गया। यहाँ मुक्ति भी लोककल्याण से जुड़ी है। गीता में कहा गया है कि ज्ञानी और योगी को भी लोकसंग्रह के लिए कर्म करना चाहिए, ताकि समाज दिशा न खो दे। इसका अर्थ यह है कि सच्चा आध्यात्मिक वही है जो संसार से कटकर नहीं, संसार के लिए जीता है। जो स्वयं शांत होकर दूसरों को भी शांति देता है।

लोकसंग्रह का अर्थ यह भी है कि हम अपने कर्मों के प्रभाव को केवल अपने तक सीमित न मानें। जो हम सोचते हैं, कहते हैं और करते हैं, उसका प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। जब हम ईमानदार होते हैं, तो भरोसा बढ़ता है। जब हम हिंसा करते हैं, तो भय फैलता है। जब हम करुणा दिखाते हैं, तो मानवता मजबूत होती है। हर छोटा कर्म समाज के बड़े ताने-बाने में धागा बन जाता है। लोकसंग्रह उस ताने-बाने को टूटने नहीं देता।

लोकसंग्रह का मार्ग कठिन है क्योंकि इसमें स्वार्थ को पीछे रखना पड़ता है। पर यही कठिनाई मनुष्य को महान बनाती है। जो अपने लाभ के लिए झूठ बोल सकता है, वह साधारण है; जो समाज के हित के लिए सत्य पर अडिग रह सकता है, वही धार्मिक है। जो अपने सुख के लिए दूसरों को कष्ट दे सकता है, वह सामान्य है; जो दूसरों के सुख के लिए अपने आराम को छोड़ सकता है, वही धर्म के मार्ग पर है।

लोकसंग्रह कोई राजनीतिक नारा नहीं, यह आत्मिक उत्तरदायित्व है। यह हमें यह सिखाता है कि हम अकेले नहीं हैं। हमारा हर श्वास, हर संसाधन, हर अवसर किसी न किसी से जुड़ा है। जब यह बोध जागता है, तब शोषण रुकता है, संग्रह की लालसा घटती है, और साझेदारी बढ़ती है। यही संतुलन प्रकृति और समाज दोनों को बचाता है।

सनातन धर्म ने इसलिए “वसुधैव कुटुम्बकम्” कहा — पूरी पृथ्वी एक परिवार है। परिवार में कोई केवल अपने लिए नहीं जीता। माँ बच्चे के लिए, पिता परिवार के लिए, भाई-बहन एक-दूसरे के लिए जीते हैं। उसी प्रकार मानव समाज में भी लोकसंग्रह का भाव परिवार की तरह होना चाहिए। जहाँ यह भाव जीवित रहता है, वहाँ धर्म जीवित रहता है।

लोकसंग्रह के बिना धर्म केवल व्यक्तिगत मुक्ति का साधन बन जाता है, और व्यक्तिगत मुक्ति यदि समाज को भूल जाए, तो वह आध्यात्मिक स्वार्थ बन जाती है। सच्चा धर्म वह है जो स्वयं को ऊँचा उठाते हुए दूसरों को गिरने न दे। यही सनातन की उदात्त दृष्टि है।

अंततः धर्म का अर्थ पूजा, व्रत या अनुष्ठान से बड़ा है। धर्म का अर्थ है — इस संसार को थोड़ा और रहने योग्य बनाना। थोड़ा और न्यायपूर्ण, थोड़ा और करुणामय, थोड़ा और संतुलित। यही लोकसंग्रह है।

इसीलिए स्मरण रहे — धर्म का सार है “लोकसंग्रह” — सबका भला। जो इसे समझ लेता है, वह केवल अपना जीवन नहीं सँवारता; वह संसार की दिशा भी सँवार देता है।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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