महर्षि गौतम की सम्पूर्ण कथा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस महामुनि की कथा सुनाने आया हूँ जिनकी साधना सत्य की कठोरता और करुणा की कोमलता दोनों का अद्भुत संगम है। जिनका जीवन यह सिखाता है कि धर्म केवल दंड नहीं, प्रायश्चित भी है। और जिनकी वाणी ने न्याय को संवेदना से जोड़ा। आज मैं तुम्हें महर्षि गौतम की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में।
महर्षि गौतम का जन्म वैदिक युग की उस पावन परम्परा में हुआ जहाँ तर्क, तप और सत्य एक दूसरे से अलग नहीं थे। बाल्यकाल से ही उनका स्वभाव गंभीर, दृष्टि तीक्ष्ण और मन न्यायप्रिय था। वे प्रश्न पूछते थे कि सत्य क्या है, भ्रम कैसे जन्म लेता है, और मनुष्य कब अपने ही कर्मों का बंधक बन जाता है। इन प्रश्नों के उत्तर वे केवल गुरु वचनों में नहीं, बल्कि स्वयं की साधना में खोजते थे। वेदों और उपनिषदों के अध्ययन से उन्होंने ऐसी विवेक दृष्टि अर्जित की जिसमें भावुकता अंधी नहीं होती और कठोरता निर्दयी नहीं रहती।
गौतम का आश्रम वन प्रदेश में स्थित था जहाँ शांति केवल मौन नहीं, अनुशासन भी थी। वहाँ शिष्य तर्क करना सीखते थे, पर अहंकार नहीं। प्रश्न उठाते थे, पर उद्दंडता नहीं। गौतम कहते थे कि सत्य को पाने के लिए बुद्धि का परिष्कार आवश्यक है और बुद्धि तभी शुद्ध होती है जब आचरण शुद्ध हो। उनके आश्रम में आहार, विहार, अध्ययन और सेवा का संतुलन था। वह न्याय का विद्यालय था, जहाँ निर्णय भावनाओं से नहीं, विवेक से होते थे।
उनका वैवाहिक जीवन भी साधना का विस्तार था। अहल्या उनकी सहधर्मिणी ही नहीं, सह साधिका भी थीं। दोनों का जीवन संयम, विश्वास और मर्यादा पर आधारित था। किंतु मनुष्य जीवन की परीक्षा आती ही है। इंद्र के छल और वासना से एक मर्यादा भंग होती है। गौतम के लिए यह केवल व्यक्तिगत घटना नहीं थी, यह धर्म का प्रश्न था। उन्होंने अहल्या को शाप दिया, जो दंड नहीं बल्कि आत्मचिंतन और प्रायश्चित का मार्ग था। वह शाप स्थिरता, मौन और प्रतीक्षा की साधना बन गया।
वर्षों तक अहल्या तप में स्थित रहीं। अपराध बोध, मौन और प्रतीक्षा के बीच। फिर वह क्षण आया जब करुणा ने न्याय को पूर्ण किया। प्रभु श्रीराम के चरण स्पर्श से अहल्या मुक्त हुईं। यह प्रसंग बताता है कि सनातन धर्म में न्याय अंतिम नहीं होता, करुणा उसका पूर्णत्व है।
महर्षि गौतम का दार्शनिक योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें न्याय दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है। प्रमाण, तर्क, अनुमान और विवेचन की सुस्पष्ट प्रणाली उन्होंने दी। उनका कहना था कि अज्ञान का उपचार केवल विश्वास से नहीं, विवेक से होता है। सत्य तक पहुँचने के लिए सही साधनों का चयन आवश्यक है। यही चिंतन भारतीय बौद्धिक परंपरा की रीढ़ बना।
गौतम कठोर अनुशासन वाले थे, पर हृदय से करुणामय। वे अन्याय के प्रति अडिग थे, पर पश्चाताप के प्रति उदार। उनके आश्रम में कोई भूखा नहीं लौटता था और कोई अहंकारी टिकता नहीं था। वे राजाओं और शिष्यों दोनों को समान विवेक से टोकते थे। उनके लिए धर्म पद नहीं, आचरण था।
जीवन के अंतिम काल में गौतम अंतर्मुखी हो गए। न्याय का भार उन्होंने शिष्यों को सौंप दिया और स्वयं आत्मा की सूक्ष्म यात्रा में उतर गए। एक संध्या वे नदी तट पर ध्यानस्थ हुए। श्वास शांत थी, मन निर्मल था और दृष्टि भीतर की ओर। रात्रि की गहराई में वन में एक अद्भुत शांति छा गई। प्रभात होते होते वह शांति प्रकाश में बदल गई और महर्षि गौतम ब्रह्म चेतना में विलीन हो गए। बिना किसी घोष के, बिना किसी विदाई के।
महर्षि गौतम का संदेश आज भी उतना ही जीवित है। सत्य बिना विवेक के कठोर हो जाता है और करुणा बिना न्याय के दिशाहीन। जब दोनों साथ चलते हैं, तभी धर्म पूर्ण होता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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