महर्षि कश्यप — एकत्व में बहुलता का संतुलन
महर्षि कश्यप — सृष्टि की विविधता और एकत्व का ऋषि
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस महामहर्षि की कथा सुनाने आया हूँ जिनके वंश से देव, दानव, मानव, नाग, गरुड़ और असंख्य जीव-जगत् उत्पन्न हुआ; जिनका जीवन सृष्टि की विविधता का आधार बना; और जिनकी साधना ने यह सिखाया कि ब्रह्म का सत्य एक है, पर उसकी अभिव्यक्तियाँ अनेक। आज मैं तुम्हें महर्षि कश्यप की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में।
महर्षि कश्यप का जन्म ब्रह्मा की मानस-संतान परम्परा में हुआ। वे उन ऋषियों में से थे जिनका तेज जन्म के साथ ही प्रकट हुआ—ऐसा तेज जो शोर नहीं करता, पर सृष्टि को दिशा देता है। बाल्यावस्था से ही उनका मन प्रश्नों से भरा था—एकत्व और बहुलता का संबंध क्या है, एक ही सत्य से भिन्न-भिन्न प्रकृतियाँ कैसे जन्म लेती हैं, और विरोधी प्रवृत्तियों के बीच संतुलन कैसे बना रहता है। उन्होंने वेदों का अध्ययन केवल मंत्रोच्चार के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि-विधान को समझने के लिए किया। इसी समझ ने उन्हें आगे चलकर प्रजापति की गरिमा प्रदान की।
कश्यप का तप अरण्यों, नदियों के तटों और हिमालय की नीरवता में हुआ। उनका तप शरीर को कष्ट देने का अभ्यास नहीं था, बल्कि चेतना को व्यापक बनाने की साधना थी। वे ध्यान में बैठते तो भिन्नताओं का कोलाहल शांत हो जाता। वे कहते थे कि जब दृष्टि सम्यक् हो जाती है, तब विरोध भी व्यवस्था का अंग बन जाता है। यही भाव उनके जीवन का मूल सूत्र था।
उनका गृहस्थ जीवन स्वयं एक जीवित उपदेश था। कश्यप ने अनेक पत्नियों के साथ गृहस्थी की, पर यह भोग का विस्तार नहीं, बल्कि सृष्टि-धर्म की स्वीकृति थी। अदिति से देवताओं का जन्म हुआ, दिति से दैत्य उत्पन्न हुए, दनु से दानव, कद्रू से नाग, विनता से गरुड़ और अरुण। यह भिन्नता उनके लिए संघर्ष का कारण नहीं थी, बल्कि संतुलन का अवसर थी। वे सबको एक ही दृष्टि से देखते—धर्मानुकूल कर्म करने वाला पूज्य और अधर्म में डूबा हुआ मार्गदर्शन का पात्र।
कश्यप का आश्रम केवल तपोवन नहीं, समन्वय का विद्यालय था। वहाँ देव और दानव दोनों आते थे, और संवाद होता था। वे समझाते थे कि शक्ति का मूल्य विवेक से तय होता है। जब दैत्य अहंकार में डूबते, वे चेतावनी देते; जब देव भी अभिमान में आते, वे उन्हें भी रोकते। उनकी करुणा पक्षपाती नहीं थी—वे दोष से घृणा करते थे, दोषी से नहीं।
कश्यप का योगदान केवल वंश-प्रसार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने ऋत-व्यवस्था, प्रकृति के नियमों को सामाजिक और नैतिक जीवन से जोड़ा। वे कहते थे कि प्रकृति से संघर्ष नहीं, संगति करनी चाहिए। इसी भाव से उन्होंने प्राणियों के संरक्षण और संतुलित जीवन का आग्रह किया। उनके आश्रम में अहिंसा थी, पर निर्बलता नहीं—यह साहसपूर्ण अहिंसा थी।
रामायण और पुराणों में कश्यप अनेक बार प्रकट होते हैं। वामन अवतार के प्रसंग में अदिति के व्रत और कश्यप की तप-दीक्षा से विष्णु का अवतरण होता है और सृष्टि का संतुलन पुनः स्थापित होता है। यह कथा केवल अवतार की नहीं, बल्कि उस गृहस्थ-तप की है जो लोक-कल्याण के लिए स्वयं को अर्पित कर देता है।
उनका जीवन संघर्षों से भी गुज़रा—दानवों का पतन, देवताओं का अहंकार और दिति का शोक। पर उन्होंने कभी निराशा को अपने निर्णयों पर हावी नहीं होने दिया। वे कहते थे कि जब तक संवाद शेष है, तब तक धर्म की संभावना शेष है। यही कारण था कि वे अंत तक जोड़ने और संतुलित करने का प्रयास करते रहे।
अंतिम काल में कश्यप अधिक मौनप्रिय हो गए। एक प्रातः नदी-तट पर ध्यान में स्थित होकर वे पूर्ण शांति में उतर गए। सूर्य की पहली किरण के साथ वातावरण में असीम शांति फैल गई और कश्यप ब्रह्म-चेतना में विलीन हो गए—बिना शोर, बिना विदाई—जैसे संतुलन स्वयं संतुलन में लौट जाए।
महर्षि कश्यप का संदेश सरल और शाश्वत है—सृष्टि की विविधता से मत डरो; उसे समझो, साधो और संतुलित रखो। जो एकत्व को भुलाकर बहुलता से लड़े, वह टूटेगा; और जो एकत्व को समझकर बहुलता को साधे, वही सच्चा ऋषि है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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