कृषि और सूर्य की पूजा का सांस्कृतिक महत्व: लोहड़ी और मकर संक्रांति का सनातन विज्ञान
भारत की आत्मा खेतों में बसती है, और उस आत्मा का सबसे बड़ा साक्षी है — सूर्य। लोहड़ी और मकर संक्रांति केवल त्योहार नहीं हैं, वे सनातन कृषि-विज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ मनुष्य के सामंजस्य का जीवंत प्रमाण हैं।
जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब उत्तरायण आरंभ होता है — अर्थात् प्रकाश की विजय, अंधकार का ह्रास। यह केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि जीवन-चक्र का संकेत है कि अब पृथ्वी में ऊर्जा का प्रवाह बढ़ेगा, बीज अंकुरित होंगे और प्रकृति फिर से मुस्कुराएगी।
लोहड़ी की अग्नि किसी लोकरीति की आग नहीं है — वह यज्ञाग्नि का आधुनिक रूप है। किसान जब अग्नि में तिल, गन्ना और अन्न अर्पित करता है, तब वह वास्तव में यह स्वीकार कर रहा होता है कि “हे प्रकृति, जो कुछ भी मुझे मिला, वह तुम्हारी ही कृपा से है।” यह वही भाव है जिसे वेदों में ऋण-भाव कहा गया — देवऋण, ऋषिऋण और प्रकृति-ऋण।
मकर संक्रांति पर सूर्य को अर्घ्य देना, तिल-गुड़ का दान और पवित्र स्नान — ये सभी कर्म ऊर्जा-संतुलन और ऋतु-परिवर्तन के वैज्ञानिक संकेत हैं। इस समय सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्ध पर सीधी पड़ती हैं, जिससे मानव शरीर का जैविक घड़ी (circadian rhythm) संतुलित होती है और विटामिन-D का स्तर बढ़ता है।
कृषि इसी समय नई फसल के लिए भूमि तैयार करती है। इसलिए यह पर्व केवल “उत्सव” नहीं बल्कि नई सृष्टि के चक्र का उद्घोष है — जहाँ किसान, सूर्य, पृथ्वी और अग्नि एक ही सूत्र में बंध जाते हैं।
यही सनातन दृष्टि है — जहाँ पूजा केवल मंदिर में नहीं, खेत में, सूरज में और अग्नि में भी होती है। 🕉️
लेखक / Writer : अभिमन्यू 🛞
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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