मोक्ष — मरने के बाद नहीं, जीते-जी मुक्त होना
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस शब्द का वास्तविक अर्थ समझाने आया हूँ जिसे लोग मृत्यु के बाद जोड़ देते हैं — मोक्ष।
सनातन धर्म मोक्ष को मरने के बाद मिलने वाली स्थिति नहीं मानता। सनातन कहता है — मोक्ष जीते-जी होता है।
मोक्ष का अर्थ है — बंधन से मुक्ति। पर बंधन क्या हैं?
घर नहीं, परिवार नहीं, धन नहीं।
बंधन हैं — डर, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, और “मैं” की अतिशय भावना।
जो व्यक्ति परिस्थितियों का दास बन जाता है, वह बंधन में है। और जो व्यक्ति परिस्थितियों में भी स्थिर रहता है, वह मुक्त है।
सनातन कहता है — मोक्ष किसी गुफा में नहीं, किसी हिमालय में नहीं, किसी मृत्यु के बाद नहीं।
मोक्ष वहीं है जहाँ मन शांत हो, जहाँ इच्छा कम हो जाए, जहाँ परिणाम का भय न रहे।
कृष्ण ने गीता में यही कहा — जो कर्म करता है पर फल में बँधता नहीं, वही मुक्त है।
मोक्ष का अर्थ सब छोड़ देना नहीं। मोक्ष का अर्थ है — सब करते हुए भी किसी चीज़ का गुलाम न होना।
घर में रहते हुए भी वैराग्य संभव है। व्यापार करते हुए भी शुद्धता संभव है। संसार में रहते हुए भी मुक्ति संभव है।
मोक्ष कोई उपलब्धि नहीं, मोक्ष एक स्थिति है। जब मन कहे — “जो है, वही पर्याप्त है।”
जिस दिन तुम्हें कुछ साबित न करना पड़े, जिस दिन तुम्हें किसी से तुलना न करनी पड़े, जिस दिन तुम्हें हार-जीत से फर्क न पड़े —
समझ लेना, मोक्ष ने तुम्हें छू लिया है।
सनातन इसलिए महान है, क्योंकि वह स्वर्ग का लालच नहीं देता, नरक का डर नहीं दिखाता।
वह कहता है — जागो, समझो, और मुक्त हो जाओ।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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