मैं गर्व से कहता हूँ — मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे विनम्र रहना सिखाता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं आपको सनातन धर्म की उस शिक्षा के बारे में बताने आया हूँ जो इंसान को ऊँचा बनाती है, पर अहंकार से दूर रखती है। यह शिक्षा है विनम्रता।
सनातन धर्म कहता है कि सच्ची महानता शोर नहीं करती। जो सच में बड़ा होता है, वह झुकना जानता है। इसी कारण हमारे यहाँ नमस्ते में हाथ जोड़े जाते हैं। यह झुकना कमजोरी नहीं है, बल्कि सामने वाले के भीतर ईश्वर को पहचानने की दृष्टि है।
हमारे शास्त्र बताते हैं कि यदि ज्ञान आने पर अहंकार आ जाए, तो वही ज्ञान बोझ बन जाता है। लेकिन यदि ज्ञान के साथ विनम्रता जुड़ी हो, तो वही ज्ञान लोक-कल्याण का साधन बन जाता है। इसी कारण हमारे ऋषि-मुनि अपनी विद्या का प्रदर्शन नहीं करते थे। वे शांत रहते थे, स्थिर रहते थे।
सनातन धर्म यह भी सिखाता है कि पद, पैसा और प्रशंसा स्थायी नहीं होते। जो आज है, वह कल नहीं भी हो सकता है। इसलिए जो मिला है, उसके लिए गर्व नहीं बल्कि कृतज्ञता रखो। और जो नहीं मिला, उसके लिए ईर्ष्या नहीं बल्कि धैर्य रखो।
मैं तु ना रिं आपसे यही कहना चाहता हूँ कि यदि आप सफल होकर भी सरल बने रहते हैं, यदि प्रशंसा के क्षणों में भी आपका मन स्थिर रहता है, और यदि आप हर मनुष्य को सम्मान देते हैं, तो समझिए आप सनातन धर्म को उसके सही अर्थों में जी रहे हैं।
विनम्र व्यक्ति कभी अकेला नहीं रहता, क्योंकि लोग बिना बुलाए उसकी ओर खिंचे चले आते हैं। यही विनम्रता की शक्ति है। यह बिना बोले भी दिल जीत लेती है।
और इसी कारण मैं पूरे गर्व से कहता हूँ कि हाँ, मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि सच्ची ऊँचाई विनम्रता में ही है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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