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उपनिषद का रहस्य: जब प्रश्न ईश्वर से भी बड़े हो गए | एक सनातनी बोध

उपनिषद का रहस्य: जब प्रश्न ईश्वर से भी बड़े हो गए | एक सनातनी बोध

उपनिषद जब प्रश्न ईश्वर से भी बड़े हो गए

An ancient Indian forest ashram setting where a Guru and Disciple are engaged in a deep spiritual dialogue, symbolizing the Upanishadic tradition.

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें उस ज्ञान परंपरा की ओर ले चलता हूँ जहाँ प्रश्न डर नहीं बल्कि साधना बन गए। यही परंपरा है उपनिषद।

उपनिषद का अर्थ है गुरु के पास बैठकर, समीप होकर, मौन में सुना गया ज्ञान। यहाँ न कोई आदेश है, न धमकी, न स्वर्ग नरक का भय। यहाँ केवल प्रश्न हैं और उन प्रश्नों से जन्मा हुआ बोध है।

उपनिषद पूछते हैं कि मैं कौन हूँ। यह संसार क्या है। दुःख क्यों है। मृत्यु के पार क्या है। और सबसे बड़ा प्रश्न यह कि ईश्वर बाहर है या भीतर।

ऋषि उत्तर थोपते नहीं। वे कहते हैं देखो, सोचो, अनुभव करो। इसी कारण उपनिषदों में संवाद मिलते हैं। राजा और ऋषि के बीच, पिता और पुत्र के बीच, गुरु और शिष्य के बीच। यहाँ शिष्य अंधविश्वासी नहीं होता, वह जिज्ञासु होता है।

उपनिषदों का साहस देखो। वे कहते हैं कि ईश्वर को भी समझो। डरो मत। प्रश्न करो।

यहीं से महान वाक्य जन्म लेते हैं। तत्वमसि। अहं ब्रह्मास्मि। सर्वं खल्विदं ब्रह्म। अर्थात जिसे तुम खोज रहे हो, वह तुम ही हो।

उपनिषद धर्म नहीं सिखाते। वे दृष्टि बदलते हैं। वे कहते हैं कि जब दृष्टि बदलती है, तब जीवन अपने आप बदल जाता है। यज्ञ बाहर से भीतर आ जाता है। देवता प्रतीक बन जाते हैं। और साधना मन के भीतर आरंभ हो जाती है।

यही कारण है कि उपनिषदों से वेदांत जन्मा, योग और गहरा हुआ, और सनातन और भी प्रखर हो गया।

सनातन इसलिए महान है क्योंकि उसने डर से नहीं, बोध से समाज रचा। और उपनिषद उस बोध का शिखर हैं।

सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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