मनुष्य का धर्म सत्य और करुणा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस सरल परंतु अत्यंत गहन सत्य को स्मरण कराने आया हूँ जिसे समझ लेने के बाद धर्म की कोई जटिल परिभाषा शेष नहीं रहती। मनुष्य का धर्म है सत्य और करुणा। यह दो अलग-अलग गुण नहीं हैं, बल्कि एक ही चेतना के दो स्वर हैं। जहाँ सत्य है पर करुणा नहीं, वहाँ कठोरता जन्म लेती है। और जहाँ करुणा है पर सत्य नहीं, वहाँ भ्रम पनपता है। मनुष्य तभी पूर्ण होता है जब उसके जीवन में सत्य की स्पष्टता और करुणा की कोमलता एक साथ बहती हैं।
सत्य मनुष्य को भीतर से सीधा रखता है। यह उसे अपने आप से झूठ बोलने नहीं देता। सत्य केवल वाणी का गुण नहीं है, यह दृष्टि का गुण है। सत्य का अर्थ है जैसा है वैसा देखना, जैसा है वैसा स्वीकार करना, और जैसा होना चाहिए वैसा बनने का साहस रखना। सत्य मनुष्य को ईमानदार बनाता है, पर यदि सत्य में करुणा न हो तो वही ईमानदारी चोट बन जाती है। इसलिए सत्य का पहला संस्कार संवेदना है।
करुणा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। करुणा का अर्थ दया दिखाना नहीं है, ऊपर से नीचे देखना नहीं है, बल्कि दूसरे के दुख को अपने भीतर महसूस करना है। करुणा यह समझ है कि हर मनुष्य किसी न किसी संघर्ष से गुजर रहा है। करुणा हमें यह सिखाती है कि हम किसी के आचरण से पहले उसकी पीड़ा को देखें। पर यदि करुणा में सत्य न हो, तो वह अंधी हो जाती है और गलत को भी सही ठहराने लगती है। इसलिए करुणा को दिशा देने के लिए सत्य आवश्यक है।
सत्य बिना करुणा के न्याय को कठोर बना देता है। करुणा बिना सत्य के न्याय को कमजोर बना देती है। पर जब दोनों साथ होते हैं, तब धर्म प्रकट होता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा ने मनुष्य से यह नहीं पूछा कि वह किस मत का है, बल्कि यह देखा कि उसके जीवन में सत्य कितना है और करुणा कितनी है। जो सत्य बोलता है पर किसी को कुचलकर, वह धर्म से दूर है। और जो करुणा दिखाता है पर असत्य को पालता है, वह भी धर्म से भटका हुआ है।
मनुष्य का धर्म किसी ग्रंथ में बंद नहीं है। वह रोज़मर्रा के जीवन में प्रकट होता है। जब कोई व्यक्ति लाभ होते हुए भी झूठ नहीं बोलता, वह सत्य में स्थित होता है। जब कोई व्यक्ति अधिकार होते हुए भी किसी को अपमानित नहीं करता, वह करुणा में स्थित होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर लेता है, वह सत्य को जीता है। जब कोई व्यक्ति दूसरे की भूल को समझकर उसे सुधारने का अवसर देता है, वह करुणा को जीता है। यही धर्म का व्यवहारिक रूप है।
सत्य मनुष्य को निर्भीक बनाता है और करुणा उसे विनम्र रखती है। निर्भीकता बिना विनम्रता के अहंकार बन जाती है और विनम्रता बिना निर्भीकता के दुर्बलता। सत्य और करुणा मिलकर मनुष्य को संतुलित बनाते हैं। ऐसा मनुष्य न तो अन्याय सहता है, न अन्याय करता है। वह अन्याय का प्रतिकार करता है, पर द्वेष नहीं पालता। वह सत्य के लिए खड़ा होता है, पर किसी को गिराने के लिए नहीं।
आज के समय में धर्म को पहचान, वेश, नारे और विवादों में बाँट दिया गया है। पर यदि कोई यह देखना चाहता है कि धर्म जीवित है या नहीं, तो उसे केवल यह देखना चाहिए कि समाज में सत्य कितना बोला जा रहा है और करुणा कितनी जी जा रही है। जहाँ झूठ सामान्य हो जाए और संवेदना दुर्लभ हो जाए, वहाँ चाहे कितनी ही पूजा हो, धर्म क्षीण हो जाता है। और जहाँ सत्य और करुणा जीवित हों, वहाँ बिना किसी विशेष नाम के भी धर्म फलता-फूलता है।
सत्य और करुणा मनुष्य को भीतर से स्वच्छ करते हैं। सत्य आत्मा को हल्का करता है और करुणा हृदय को विस्तृत करती है। सत्य से मनुष्य अपने बोझ उतारता है और करुणा से वह दूसरों का बोझ समझता है। यही संतुलन मनुष्य को शांत बनाता है। और शांति ही धर्म का वास्तविक फल है।
अंततः धर्म का उद्देश्य स्वर्ग पाना नहीं, बल्कि मनुष्य बनना है। और मनुष्य वही है जो सत्य में खड़ा हो और करुणा में झुका हो। जो झुकते समय भी झूठ न बोले और खड़े होते समय भी किसी को कुचले नहीं। यही सनातन दृष्टि है, यही जीवन का सार है।
इसलिए स्मरण रहे। मनुष्य का धर्म किसी पहचान का नाम नहीं है। मनुष्य का धर्म है सत्य और करुणा। जो सत्य को करुणा के साथ जी लेता है, उसके लिए जीवन ही धर्म बन जाता है, और उसका होना ही संसार के लिए आशीर्वाद बन जाता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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