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आओ न मेरे श्याम: एक निर्धन वैश्य की वह सरल पुकार, जिसके लिए तूफ़ान में भी खिंचे चले आए श्रीकृष्ण

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आओ न मेरे श्याम: एक निर्धन वैश्य की वह सरल पुकार, जिसके लिए तूफ़ान में भी खिंचे चले आए श्रीकृष्ण

सच्चे हृदय की पुकार और ईश्वर का आगमन

A spiritual digital painting of a humble devotee opening his door on a rainy night to find a divine youth (Krishna) standing outside

यह कथा उस समय की है जब ईश्वर को पाने के लिए न तो शास्त्रों का भार आवश्यक था, न ही बड़े-बड़े तप, केवल एक सरल और सच्चा हृदय ही पर्याप्त था।

उत्तर भारत के एक छोटे से नगर में एक निर्धन वैश्य रहता था। न वह बड़ा विद्वान था, न कोई साधु, न ही समाज में उसका कोई विशेष मान था। दिन भर वह अपने छोटे से दुकान में बैठकर तेल और अनाज का व्यापार करता, और रात होते ही सब कुछ समेटकर अपने कच्चे घर की ओर लौट जाता। उसके पास धन नहीं था, पर उसके पास एक अमूल्य निधि थी—अपने ठाकुर के प्रति अटूट प्रेम।

रात का उसका नियम अटल था। भोजन के बाद वह मिट्टी का दिया जलाता, ज़मीन पर एक पुराना कंबल बिछाता और एक छोटी सी पीतल की मूर्ति के सामने बैठ जाता। न कोई मंत्र, न कोई जटिल विधि—बस वही एक पंक्ति, जो उसके हृदय से निकलती थी—“आओ न मेरे श्याम…”। उसी को वह बार-बार गुनगुनाता, कभी स्वर में, कभी अश्रुओं में।

नगर के लोग उसका उपहास करते थे। कोई कहता, “पागल है”, कोई कहता, “इतनी सादगी से भगवान थोड़े ही मिलते हैं।” पर वह कुछ नहीं कहता। उसका विश्वास शब्दों में नहीं, साँसों में बसता था।

एक रात नगर में भयंकर तूफ़ान आया। आकाश गरज रहा था, बिजली चमक रही थी और वर्षा मानो धरती को डुबो देना चाहती थी। लोग अपने-अपने घरों में दुबक गए। उस वैश्य ने भी दरवाज़ा बंद किया, पर अपने ठाकुर के सामने दिया जलाना नहीं भूला। हवा इतनी तेज़ थी कि दिया बार-बार बुझ जाता, पर वह हर बार काँपते हाथों से उसे फिर जला देता।

उस रात उसने वही पंक्ति फिर गाई—“आओ न मेरे श्याम…”। आवाज़ काँप रही थी, देह ठंड से थरथरा रही थी, पर मन अडिग था।

अचानक उसे लगा कि किसी ने बाहर से द्वार खटखटाया।

पहले तो उसने सोचा, यह भ्रम होगा। ऐसे तूफ़ान में कौन आएगा? पर खटखटाहट फिर हुई—धीमी, संयत, मानो कोई संकोच में हो। वह उठा, द्वार खोला।

बाहर एक किशोर खड़ा था। साँवला शरीर, भीगे हुए केश, नंगे पाँव, और आँखों में ऐसा अपनापन कि वैश्य का हृदय भर आया। उसने बिना पूछे भीतर आने का संकेत किया। किशोर चुपचाप भीतर आया, दीये के पास बैठ गया और आग की ओर हाथ बढ़ाकर उन्हें सेंकने लगा।

कुछ देर तक दोनों मौन रहे। फिर वैश्य ने संकोच से कहा, “इतनी रात गए, इस तूफ़ान में आप कहाँ से आए?”

किशोर मुस्कुराया और बोला, “जहाँ बुलाया गया, वहीं से चला आया।”

वैश्य चौंक गया। उसके नेत्र भर आए। उसने काँपते स्वर में पूछा, “क्या… क्या आप वही हैं…?”

किशोर ने कोई उत्तर नहीं दिया। बस उसकी ओर देखा—और उस दृष्टि में इतना प्रेम था कि वैश्य फूट-फूटकर रो पड़ा। वह समझ गया कि वर्षों से जिसे वह एक ही पंक्ति में बुला रहा था, वह आज स्वयं चलकर आ गया है।

उसने रोते हुए कहा, “मेरे पास न अन्न है, न वस्त्र, न कोई सेवा… मैं आपके योग्य नहीं।”

तभी वह किशोर—जो अब उसे साक्षात् श्रीकृष्ण प्रतीत हो रहे थे—मधुर स्वर में बोले, “मैं योग्य नहीं, भाव देखता हूँ। तुमने जो दिया जलाया, वह मेरे लिए सूर्य से भी अधिक प्रकाशमान है। तुमने जो पंक्ति गाई, वह मेरे लिए वेदों से भी मधुर है।”

यह कहकर वे उठे। द्वार की ओर बढ़ते हुए बोले, “जब-जब तुम मुझे ऐसे पुकारोगे, मैं आऊँगा—तूफ़ान हो या अँधेरा, दूरी हो या बाधा।”

और अगले ही क्षण वह वहाँ नहीं थे।

अगली सुबह नगर में चर्चा फैल गई। उस वैश्य के घर से ऐसी शांति और ऐसी सुगंध आ रही थी, जैसी किसी ने पहले न देखी थी। पर वैश्य अब कुछ नहीं कहता था। वह जान चुका था—ईश्वर को पाने के लिए बड़े होने की नहीं, सच्चा होने की आवश्यकता होती है।

उसके बाद वह वही दुकान चलाता रहा, वही सादा जीवन जिया, पर उसकी आँखों में अब कोई कमी नहीं थी। क्योंकि जिसने एक बार प्रेम से पुकारा हो, और जिसे प्रभु स्वयं चलकर मिलने आए हों—उसके जीवन में फिर क्या शेष रह जाता है?

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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