मैं गर्व से कहता हूँ — मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे स्वीकार करना सिखाता है, हार मानना नहीं
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं आपको सनातन धर्म की उस शांत लेकिन बहुत गहरी शिक्षा के बारे में बताना चाहता हूँ जो जीवन के सबसे कठिन क्षणों में मन को संभाल लेती है—स्वीकार।
अक्सर लोग स्वीकार को कमजोरी समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि जो हुआ उसे मान लेना मतलब हार मान लेना। लेकिन सनातन धर्म ऐसा नहीं सिखाता। यह कहता है—जो हुआ है, उसे समझो, और जो करना है, वह पूरे साहस से करो।
हमारे धर्म में भाग्य को कोसना नहीं सिखाया गया, और न ही आँख बंद करके सब कुछ सह लेना। सनातन कहता है—जो तुम्हारे हाथ में नहीं है, उसे शांति से स्वीकार करो। और जो तुम्हारे हाथ में है, उसमें पूरा पुरुषार्थ लगाओ।
जब हम हर बात से लड़ते रहते हैं, तो मन थक जाता है। लेकिन जब हम कुछ बातों को समझदारी से स्वीकार कर लेते हैं, तो मन हल्का हो जाता है। और हल्का मन सही निर्णय ले पाता है।
सनातन धर्म यह सिखाता है कि स्वीकार करने से इंसान रुकता नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की शक्ति पाता है। जो बीत गया, उससे सीख लो। जो सामने है, उसका सामना करो। और जो मिलेगा, उसे कृतज्ञता से अपनाओ।
मैं तु ना रिं आपसे यही कहना चाहता हूँ—अगर आपके जीवन में कोई ऐसा मोड़ आया है जहाँ आप बहुत कुछ बदल नहीं सकते, तो अपने मन से लड़िए मत। शांत होकर स्वीकार कीजिए। क्योंकि जब मन शांत होता है, तभी रास्ते साफ़ दिखते हैं।
और यही गहरी समझ सनातन धर्म को इतना संतुलित और मजबूत बनाती है। न अति विरोध, न अति समर्पण—बस विवेक।
इसीलिए मैं पूरे गर्व से कहता हूँ—“हाँ, मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बुद्धि है।”
लेखक / Writer : अभिमन्यू 🛞
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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