अश्वमेघ यज्ञ और देवपुर का महासंग्राम
यह कथा उन दिनों की है जब अयोध्या के महाराज श्रीराम ने लोक-मर्यादा, धर्म-संतुलन और राजधर्म की पूर्णता के लिए अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान आरंभ किया था। यह केवल एक यज्ञ नहीं था, बल्कि पृथ्वी पर धर्म की स्थिरता की घोषणा थी। यज्ञ का अश्व दिशाओं में स्वतंत्र विचरण कर रहा था और उसके साथ शत्रुघ्न के नेतृत्व में अयोध्या की विशाल चतुरंगिणी सेना चल रही थी। उस सेना में केवल सामान्य योद्धा नहीं थे—वहाँ हनुमान जैसे महावीर थे, सुग्रीव जैसे पराक्रमी वानरराज थे और भरत-पुत्र पुष्कल जैसे युवा लेकिन अग्नि-सदृश शौर्य वाले वीर थे। श्रीराम का प्रभाव ऐसा था कि अधिकांश राजा बिना युद्ध के ही उनके ध्वज के नीचे आना अपना सौभाग्य समझते थे। इसलिए यह दिग्विजय अधिक रक्तरंजित नहीं थी, बल्कि मर्यादा से भरी हुई थी।
अश्व अनेक प्रदेशों को पार करता हुआ अंततः देवपुर नामक राज्य में पहुँचा। यह राज्य राजा वीरमणि के अधीन था, जो स्वयं धर्मनिष्ठ, शिवभक्त और श्रीराम के प्रति आदरभाव रखने वाला राजा था। उसका राज्य महादेव की तपस्या से सुरक्षित माना जाता था। राजा वीरमणि के दो पुत्र थे—रुक्मांगद और शुभंगद—दोनों ही युद्धविद्या में निपुण और आत्मसम्मान से परिपूर्ण। उनका छोटा भाई वीरसिंह भी अतिरथी था। देवपुर में यह विश्वास दृढ़ था कि जब स्वयं महादेव रक्षा करते हों, तब किसी बाह्य शक्ति से भय नहीं।
जब अश्व देवपुर की सीमा में पहुँचा, तब रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया। यह कार्य उसने अपमान की भावना से नहीं, बल्कि क्षत्रिय धर्म की परीक्षा के रूप में किया। जब यह समाचार राजा वीरमणि तक पहुँचा, तो वे चिंतित हो उठे। उन्होंने अपने पुत्र को समझाया कि यह अश्व श्रीराम के यज्ञ का है और श्रीराम उनके मित्र तथा आदरणीय हैं। पर रुक्मांगद का उत्तर भी धर्म से ही उपजा था—एक बार युद्ध की चुनौती दी जा चुकी थी, अब बिना युद्ध अश्व लौटाना दोनों पक्षों के लिए अपमानजनक होगा। राजा वीरमणि ने पुत्र की बात में क्षत्रिय मर्यादा की गूँज देखी और अनिच्छा से युद्ध की अनुमति दे दी।
इधर जब शत्रुघ्न को अश्व के बंदी होने का समाचार मिला, तो उन्होंने इसे यज्ञ की अवमानना माना और सेना को युद्ध के लिए सज्जित किया। शत्रुघ्न ने वीरों से पूछा कि कौन अश्व को मुक्त कराएगा। पुष्कल ने आगे बढ़कर यह दायित्व माँगा। उसकी वाणी में युवावस्था का तेज था, पर उसमें श्रीराम के कुल का आत्मविश्वास भी था। अन्य वीर भी युद्ध को तत्पर थे, पर हनुमान ने सावधानी की बात कही। उन्होंने स्मरण कराया कि यह राज्य शिवरक्षित है और यहाँ युद्ध केवल बाहुबल का नहीं, दैवी मर्यादा का प्रश्न बन सकता है। शत्रुघ्न ने इसे क्षत्रिय धर्म की परीक्षा मानते हुए युद्ध का निर्णय लिया।
रणभूमि में दोनों सेनाएँ आमने-सामने आ खड़ी हुईं। पुष्कल और राजा वीरमणि का युद्ध अत्यंत भयानक था। दोनों के अस्त्र आकाश को विदीर्ण कर रहे थे। अंततः पुष्कल के तीक्ष्ण बाणों से वीरमणि मूर्छित हो गए। दूसरी ओर हनुमान और वीरसिंह का युद्ध हुआ, जिसमें हनुमान के अतुल बल के आगे वीरसिंह का रथ चूर-चूर हो गया। शत्रुघ्न ने रुक्मांगद और शुभंगद को परास्त कर दिया। देवपुर की सेना पराजय की ओर बढ़ने लगी।
मूर्छा से जागे राजा वीरमणि ने जब यह दृश्य देखा तो उन्होंने अंतिम आश्रय के रूप में महादेव का स्मरण किया। भक्त की पुकार व्यर्थ नहीं जाती। वीरभद्र के नेतृत्व में शिवगण रणभूमि में उतरे। उनका स्वरूप ही भय उत्पन्न करने वाला था। यह देखकर अयोध्या की सेना क्षण भर को स्तब्ध रह गई। पुष्कल ने इसे भी चुनौती मानकर वीरभद्र से युद्ध किया, पर यह युद्ध सामर्थ्य का नहीं, काल का था। पुष्कल ने अपने दिव्यास्त्रों से आकाश भर दिया, पर वीरभद्र हँसते रहे। अंततः क्रोध में आकर वीरभद्र ने पुष्कल का मस्तक काट दिया। युवा पुष्कल वीरगति को प्राप्त हुआ।
हनुमान जब पहुँचे तो सब कुछ घट चुका था। उनका क्रोध प्रलय-समान था। हनुमान और वीरभद्र का युद्ध ऐसा था मानो दो काल-शक्तियाँ टकरा रही हों। हनुमान के शरीर से रक्त बह रहा था, फिर भी उन्होंने वीरभद्र का वक्ष विदीर्ण कर दिया। उधर शिवगणों ने शत्रुघ्न को बाँध लिया। स्थिति अत्यंत विकट हो गई।
तभी समस्त सेना ने एक स्वर में श्रीराम का स्मरण किया। श्रीराम लक्ष्मण और भरत सहित रणभूमि में प्रकट हुए। उनके आते ही सेना में नया प्राण संचार हुआ। श्रीराम ने पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया। भरत ने पुष्कल को मृत देखकर शोक में अस्त्र उठा लिए। श्रीराम और उनके भाइयों ने शिवगणों का सामना किया, पर अंततः स्वयं महादेव रणभूमि में प्रकट हुए।
श्रीराम ने शस्त्र त्यागकर शिव की स्तुति की। हरि और हर का यह संवाद युद्ध से बड़ा था—यह धर्म और करुणा का संगम था। अंततः पाशुपतास्त्र के संधान पर महादेव संतुष्ट हुए। उन्होंने युद्ध रोक दिया और श्रीराम के वरदान-याचन पर पुष्कल सहित सभी वीरों को जीवनदान दिया।
यज्ञ का अश्व लौटा, युद्ध समाप्त हुआ और देवपुर का राज्य धर्मपूर्वक आगे बढ़ा। यह कथा केवल युद्ध की नहीं है, यह मर्यादा, भक्ति और संकल्प की कथा है—जहाँ श्रीराम राजा हैं, हनुमान सेवा हैं और महादेव स्वयं धर्म के साक्षी।
लेखक / Writer : अभिमन्यू 🛞
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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