महर्षि क्रतु — संकल्प और यज्ञ की अखंड परंपरा
सनातन परंपरा में कुछ ऋषि ऐसे हैं जिनका नाम बहुत कम लिया जाता है, पर जिनके बिना वैदिक व्यवस्था की कल्पना भी अधूरी है। ऐसे ही एक महर्षि हैं महर्षि क्रतु—परमपिता ब्रह्मा के मानस–पुत्र, सप्तर्षि एवं प्रजापतियों में गिने जाने वाले, जिनका जीवन स्वयं यज्ञ की तरह था—संयम, संकल्प और शुद्ध कर्म की अखंड आहुति। शास्त्र कहते हैं कि उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के हाथ से हुई, अर्थात वे केवल देह से नहीं, कर्म-संस्कृति से जन्मे थे। उनका नाम ही उनका स्वभाव था—‘क्रतु’, अर्थात वह दृढ़ संकल्प जो मनुष्य को चंचलता से निकालकर धर्म के स्थिर पथ पर स्थापित कर दे। इसी कारण वे विश्व के महानतम बुद्धिजीवियों में माने गए, क्योंकि उनकी बुद्धि केवल ज्ञान-संचय नहीं, जीवन-विन्यास थी।
पुरातन परंपरा बताती है कि आदिकाल में वेद एक ही स्वरूप में ब्रह्मदेव द्वारा प्रकट हुए। पर जब समय, समाज और साधना के विविध रूप सामने आए, तब वेदों के व्यवस्थित विभाजन की आवश्यकता हुई। अपने पिता की आज्ञा से महर्षि क्रतु ने इस महान दायित्व में सहायता की और उसी प्रक्रिया में वेद चार धाराओं—ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद—में प्रवाहित हुए। यह विभाजन विद्या को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि साधक की पात्रता के अनुसार उसे सुलभ बनाने के लिए था। इस अद्भुत बौद्धिक और आध्यात्मिक सामर्थ्य से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनका नाम ‘क्रतु’ रखा—शक्ति, सामर्थ्य और संकल्प का प्रतीक।
महर्षि क्रतु का महत्व केवल वेद-विभाजन तक सीमित नहीं रहा। ‘क्रतु’ शब्द का एक अर्थ ‘आषाढ़’ भी माना गया है, और शास्त्रों में आषाढ़ मास को यज्ञों के लिए विशेष बताया गया है। इस प्रकार आषाढ़ में होने वाले यज्ञ महर्षि क्रतु के प्रति सम्मान और स्मरण भी हैं—मानो समय स्वयं उनके नाम का उच्चारण करता हो। भूगोल और पुराण एक-दूसरे में गुंथे हैं; कहा गया है कि प्लक्षद्वीप की महान नदी का नाम भी ‘क्रतु’ है, जिसकी तुलना जम्बूद्वीप की गंगा से की जाती है—यह संकेत है कि उनका प्रभाव केवल आकाशीय या वैदिक नहीं, भौतिक धरातल पर भी प्रवाहित हुआ।
पुराणों में उनके पारिवारिक जीवन का भी विस्तार मिलता है। उनकी दो बहनों—पुण्य और सत्यवती—का उल्लेख आता है। पिता की आज्ञा से उन्होंने प्रजापति दक्ष की पुत्री सन्नति से विवाह किया। इस दांपत्य से उन्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त हुए, जिन्हें ‘बालखिल्य’ कहा गया। ये बालखिल्य आकार में अँगूठे के समान बताए गए हैं, पर तप में विशाल। वे सभी भगवान सूर्यनारायण के उपासक थे। कहा जाता है कि वे सूर्यदेव के रथ के आगे-आगे चलकर स्तुति करते हैं, और उनके सामूहिक तप की शक्ति से ही सूर्यदेव संसार का पोषण करते हैं। यह कथा बताती है कि शक्ति संख्या में नहीं, संकल्प की एकाग्रता में होती है।
एक प्रसिद्ध प्रसंग में, महर्षि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप द्वारा किए जा रहे यज्ञ में महर्षि क्रतु अपने बालखिल्य पुत्रों सहित पधारे। उसी यज्ञ में देवराज इंद्र और बालखिल्यों के बीच विवाद हुआ। मध्यस्थता के बाद, बालखिल्यों ने महर्षि कश्यप को पुत्र-रूप में पक्षीराज गरुड़ प्रदान किए—एक ऐसा प्रसंग जो यह दर्शाता है कि तप और संकल्प सृष्टि की दिशा बदल सकते हैं। आगे चलकर महर्षि क्रतु और सन्नति की एक पुत्री पुण्य भी बताई गई, तथा पर्वासा नाम की पुत्रवधु का उल्लेख मिलता है। कुछ ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि उन्होंने महर्षि अगस्त्य के पुत्र ईधवाहा को गोद लिया और अगस्त्य के वातापि-भक्षण तथा समुद्र-पीने जैसे महान कार्यों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
राजर्षियों के साथ भी उनका संबंध गहरा था। मनु के पुत्र उत्तानपाद पर उनकी विशेष कृपा थी, और वे ध्रुव से अत्यंत स्नेह करते थे। जब ध्रुव अपने पिता से उपेक्षित होकर परमलोक की खोज में निकले, तो वे पहले महर्षि क्रतु के पास पहुँचे। क्रतु ने उन्हें भगवान विष्णु की तपस्या का मार्ग दिखाया। आगे चलकर देवर्षि नारद के उपदेश से ध्रुव ने घोर तप किया और अमर ध्रुवलोक को प्राप्त किया। आकाश में स्थित ध्रुव तारा उसी का प्रतीक माना गया है, जो सृष्टि के अंत तक स्थिर रहेगा। ध्रुव के प्रति अपने प्रेम के कारण महर्षि क्रतु को उसके समीप स्थित बताया गया है। खगोलशास्त्र में उत्तर दिशा में ध्रुव तारे की प्रदक्षिणा करने वाले एक तारे का नाम भी ‘क्रतु’ माना गया है—जहाँ विज्ञान और पुराण एक-दूसरे से संवाद करते प्रतीत होते हैं।
कालांतर में, वाराहकल्प में महर्षि क्रतु के महर्षि वेदव्यास के रूप में अवतार लेने का भी वर्णन मिलता है। जिस प्रकार क्रतु ने वेदों के विभाजन में भूमिका निभाई, उसी प्रकार वेदव्यास ने पुराणों की रचना कर उन्हें अठारह भागों में विभाजित किया। महाराज भरत द्वारा पूछे गए पूर्वरंग के देवताओं के चरित्र से जुड़े प्रश्नों का समाधान भी महर्षि क्रतु ने अपने गहन ज्ञान से किया—यह दिखाता है कि उनका ज्ञान केवल ग्रंथों में नहीं, जीवंत संवाद में था।
मैत्रेय संहिता के अनुसार एक प्रसंग में, जब देवताओं ने यज्ञ में प्राप्त पशुओं का विभाजन कर भगवान रुद्र को कुछ नहीं दिया, तब रुद्र के क्रोध से देवताओं पर आक्रमण हुआ। उस रौद्र लीला में क्रतु के अंडकोषों का नाश भी बताया गया है। बाद में ब्रह्मा की स्तुति से रुद्र शांत हुए, ‘पशुपति’ कहलाए, और सब कुछ पूर्ववत कर दिया। इसी के पश्चात महर्षि क्रतु ने सन्नति से विवाह किया—यह कथा बताती है कि सनातन परंपरा में पुरुषार्थ और संयम को कितनी गहराई से जोड़ा गया है।
भगवद्गीता के नवें अध्याय में स्वयं कृष्ण महर्षि क्रतु के सम्मान में कर्मकांड की महिमा का उद्घोष करते हैं— “अहं क्रतुरहं यज्ञः…” यहाँ ‘क्रतु’ केवल यज्ञ नहीं, उस संकल्प का प्रतीक है जो कर्म को ईश्वरार्पण बना देता है। यही महर्षि क्रतु की स्थायी विरासत है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि अनुशासन दमन नहीं, दिशा है; व्रत कठोरता नहीं, स्पष्टता है; और कर्म तभी पवित्र होता है जब उसके मूल में करुणा और सत्य हों। आज भी, जब हम यज्ञ, व्रत या वैदिक अनुशासन की बात करते हैं, तो अनजाने ही महर्षि क्रतु के संकल्प की छाया में खड़े होते हैं—जहाँ कर्म तप बन जाता है और संकल्प स्वयं साधना।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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