मैं गर्व से कहता हूँ — मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे आसक्ति से मुक्त होना सिखाता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं आपको सनातन धर्म की उस शिक्षा के बारे में बताने आया हूँ जो इंसान को भीतर से हल्का बना देती है — वैराग्य, यानी आसक्ति से दूरी।
बहुत लोग वैराग्य को सब कुछ छोड़ देने का नाम समझ लेते हैं। लेकिन सनातन धर्म ऐसा नहीं कहता। यह कहता है — चीज़ें रखो, पर चीज़ों में फँसो मत। रिश्ते निभाओ, पर उनसे बँधकर टूटो मत।
हम दुःखी तब होते हैं जब किसी चीज़ को हमेशा के लिए अपना समझ लेते हैं। जब अपेक्षाएँ बहुत बढ़ जाती हैं, और जीवन वैसा नहीं चलता जैसा हमने सोचा था। सनातन धर्म हमें सिखाता है — जो आया है, वह जाएगा भी। इस सच्चाई को समझ लेना दुख को आधा कर देता है।
वैराग्य का मतलब प्रेम छोड़ना नहीं, बल्कि प्रेम में स्वतंत्र रहना है। जब हम किसी से बिना स्वार्थ के प्रेम करते हैं, तो खोने का डर नहीं रहता। और जहाँ डर नहीं, वहीं शांति है।
सनातन धर्म कहता है कि जिसने आसक्ति छोड़ दी, उसने जीवन का सबसे बड़ा बोझ उतार दिया। तब सफलता मिले या असफलता, मान मिले या अपमान — मन स्थिर रहता है।
मैं तु ना रिं आपसे यही कहना चाहता हूँ — जीवन को कसकर मत पकड़िए। थोड़ा ढीला छोड़िए। जो आपके पास है, उसका आनंद लीजिए। और जो चला जाए, उसे जाने दीजिए। यही वैराग्य है। यही स्वतंत्रता है।
और इसी गहरी समझ के कारण मैं पूरे गर्व से कहता हूँ — “हाँ, मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि आसक्ति छोड़ने से ही असली शांति मिलती है।”

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