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महर्षि नारद — चलता-फिरता वेद

महर्षि नारद — चलता-फिरता वेद

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें उस ऋषि की कथा सुनाने आया हूँ जो चलता-फिरता वेद है, जिसकी वीणा से भक्ति की धारा बहती है, और जिसकी उपस्थिति से अहंकार टूटता है और विवेक जागता है—आज मैं तुम्हें महर्षि नारद की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में, बिना किसी उपशीर्षक के।

महर्षि नारद का जन्म साधारण नहीं था। पुराणों में कहा गया है कि वे ब्रह्मा के मानसपुत्र हैं—विचार से उत्पन्न चेतना। बाल्यकाल से ही उनके भीतर एक असामान्य उत्कंठा थी—ईश्वर को जानने की, सत्य को अनुभव करने की। प्रारम्भ में वे सेवाभाव से ऋषियों के आश्रम में रहते, उनके चरण धोते, कथा सुनते और मनन करते। वही सेवा उनके भीतर भक्ति का बीज बन गई। एक दिन उन्होंने वह दिव्य स्वाद चखा जिसे शास्त्र ‘हरि-कथा-रस’ कहते हैं—और फिर संसार उन्हें बाँध न सका। उस क्षण से उनका जीवन एक ही धुन में बंध गया—नारायण-स्मरण।

नारद का स्वभाव चंचल दिखता है, पर भीतर से वह अत्यंत स्थिर था। वे लोक-लोक घूमते—देवलोक, पृथ्वीलोक, पाताल—पर किसी लोक के नहीं बनते। उनकी वीणा से “नारायण, नारायण” की ध्वनि उठती और जहाँ भी पड़ती, वहाँ का अहंकार हिल जाता। वे उपदेशक नहीं, जाग्रतकर्ता थे। वे प्रश्न करते, परिस्थितियाँ रचते, और मनुष्य को उसके ही आईने में दिखा देते। इसीलिए कभी-कभी उन्हें विघ्नकर्ता कहा गया, पर वास्तव में वे विघ्न नहीं, आवरण हटाते थे।

नारद की साधना भक्ति की चरम साधना थी—न निर्गुण से विमुख, न सगुण से बँधी। वे कहते थे कि प्रेम ही वह सेतु है जिससे आत्मा ब्रह्म तक पहुँचती है। उन्होंने नारद-भक्ति-सूत्रों में भक्ति को परिभाषित किया—जहाँ भक्ति न सौदा है, न भय; वह तो सहज समर्पण है। उनके लिए ज्ञान शुष्क नहीं था; वह करुणा में घुला हुआ था। इसीलिए वे राजाओं को भी उतनी ही सरलता से समझाते जितनी सरलता से ग्वालों को।

पुराणों में नारद का हस्तक्षेप निर्णायक मोड़ों पर दिखता है। ध्रुव की कथा में वही नारद हैं जो पहले बालक को तप का कठोर मार्ग बताते हैं—और फिर उसी तप से उसे अडिग ध्रुव बना देते हैं। प्रह्लाद की कथा में वही नारद हैं जो गर्भ में ही शिशु को भक्ति का संस्कार देते हैं—और हिरण्यकश्यप के अत्याचार के बीच भी प्रेम की लौ बुझने नहीं देते। वाल्मीकि की कथा में वही नारद हैं जो डाकू के हाथ में वीणा का बीज रख देते हैं—और रामायण का स्रोत बहा देते हैं। उनका स्पर्श कर्म को कथा बना देता है और कथा को धर्म।

नारद का जीवन किसी एक आश्रम में नहीं बंधा। वे जहाँ अन्याय देखते, वहाँ विवेक बोते; जहाँ अहंकार देखते, वहाँ विनय जगाते। वे देवताओं को भी नहीं बख्शते—जब उनमें अभिमान आता, नारद की वीणा वहीं बजती। वे कहते थे कि ईश्वर का स्मरण तभी सार्थक है जब उससे दया जन्म ले। इसलिए वे कर्म को भक्ति से जोड़ते और भक्ति को सेवा से। उनका संदेश सरल था—यदि हृदय में प्रेम नहीं, तो मंत्र शोर हैं।

उनकी देहावसान की कथा भी रहस्यपूर्ण है। कहा जाता है कि नारद देह छोड़ते नहीं; वे लीला बदलते हैं। वे काल की सीमा में नहीं बँधते, क्योंकि भक्ति कालातीत होती है। जहाँ भी कोई सच्चे भाव से हरि-नाम लेता है, वहाँ नारद की वीणा की सूक्ष्म ध्वनि सुनाई देती है—ऐसा माना जाता है। वे उपस्थित होते हैं, पर दिखाई नहीं देते—जैसे प्रेरणा।

महर्षि नारद का संदेश आज भी उतना ही जीवित है—भक्ति को संकीर्ण मत बनाओ; उसे करुणा बनाओ। प्रश्न से डरो मत; प्रेम से पूछो। और जहाँ भी जाओ, भीतर की वीणा को सुर में रखो—क्योंकि वही सुर संसार को जोड़ता है।

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