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त्याग का सही अर्थ: छोड़ना नहीं, बल्कि आसक्ति के बोझ से हल्का होना

त्याग — छोड़ना नहीं, हल्का होना

A spiritual illustration of a lotus flower in water, symbolizing the Sanatan principle of Tyaga (detachment)—living in the world without being affected by its burdens

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस शब्द का मर्म बताने आया हूँ जिसे लोग डर से देखते हैं — त्याग। लोग समझते हैं त्याग मतलब सब छोड़ देना। पर सनातन कहता है — त्याग मतलब बोझ छोड़ देना।

त्याग वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का होता है। घर छोड़ना त्याग नहीं, घर में रहते हुए मालिक न बनना त्याग है।

धन छोड़ना त्याग नहीं, धन को अपने ऊपर हावी न होने देना त्याग है।

रिश्ते छोड़ना त्याग नहीं, रिश्तों में अपेक्षा और अधिकार छोड़ना त्याग है।

सनातन ने संन्यास को भी त्याग का अंतिम रूप नहीं माना। क्योंकि संन्यास बाहर का हो सकता है, पर त्याग हमेशा भीतर का होता है।

जो व्यक्ति हर बात अपने अनुसार चाहता है, वह भले ही गुफा में बैठा हो, त्यागी नहीं है।

और जो व्यक्ति संसार में रहते हुए परिस्थितियों को स्वीकार कर ले, वह सच्चा त्यागी है।

त्याग का सबसे बड़ा लाभ यह है — यह मन को हल्का कर देता है। और हल्का मन तेज़ चलता है, दूर देखता है, और गहराई में उतरता है।

आज लोग सब कुछ पकड़कर रखना चाहते हैं — सफलता, सम्मान, रिश्ते, पहचान।

और फिर कहते हैं — मन भारी क्यों है?

सनातन सरल उत्तर देता है — जिसे पकड़ोगे, वही तुम्हें पकड़ेगा।

त्याग डर नहीं, स्वतंत्रता है। जो छोड़ सकता है, वही सच में चुन सकता है।

और जो चुन सकता है, वही अपने जीवन का सचेत रचयिता बनता है।

✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला

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