पुनर्जन्म — अधूरी कहानियों का अगला अध्याय
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस सिद्धांत की गहराई में ले चलता हूँ जो सनातन की आत्मा है — पुनर्जन्म।
सनातन धर्म कहता है — जीवन एक कहानी नहीं, श्रृंखला है। हर जन्म पिछले अध्याय का परिणाम है।
आत्मा सफेद काग़ज़ लेकर नहीं आती। वह अपने कर्म, अपने संस्कार, अपने अधूरे पाठ साथ लेकर आती है।
इसीलिए कुछ बच्चे शांत पैदा होते हैं, कुछ क्रोधी, कुछ संगीत में, कुछ ध्यान में।
यह सब पिछली यात्राओं की छापें हैं।
पुनर्जन्म का अर्थ भाग्य में फँसना नहीं। पुनर्जन्म का अर्थ है — सुधार का अवसर।
यदि एक जीवन में तुम्हें क्रोध ने हराया, अगले जीवन में तुम्हें फिर मौका मिलेगा।
यदि एक जीवन में तुमने प्रेम सीखा, अगले में वह और गहरा होगा।
कर्म तुम्हें दंड नहीं देता, कर्म तुम्हें सिखाता है।
सनातन में नरक और स्वर्ग स्थायी नहीं हैं। वे शिक्षा की अवस्थाएँ हैं।
स्थायी केवल एक है — मोक्ष जहाँ जन्म–मरण का चक्र रुक जाता है।
जब आत्मा सबक सीख लेती है, तो उसे कक्षा बदलनी नहीं पड़ती।
वह घर लौट जाती है।
पुनर्जन्म डराने का सिद्धांत नहीं, आशा का विज्ञान है।
यह कहता है — यदि आज चूक गए, तो कल सुधर सकते हो।
और यही सनातन की करुणा है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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