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महर्षि जमदग्नि की सम्पूर्ण कथा

महर्षि जमदग्नि की सम्पूर्ण कथा

महर्षि जमदग्नि की सम्पूर्ण कथा

Maharishi Jamadagni

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस ऋषि की कथा सुनाने आया हूँ जिनका जीवन तप, मर्यादा और न्याय के कठोर संतुलन का साक्ष्य है; जिनकी गृहस्थी स्वयं साधना बनी; और जिनके संस्कारों से वह महापुरुष उत्पन्न हुआ जिसने अधर्म के विरुद्ध शस्त्र उठाए—आज मैं तुम्हें महर्षि जमदग्नि की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में, बिना किसी उपशीर्षक के।

महर्षि जमदग्नि का जन्म भृगुवंश में हुआ—उस वंश में जहाँ विवेक, निर्भीकता और धर्म के लिए प्रश्न उठाने की परम्परा थी। बाल्यकाल से ही जमदग्नि का स्वभाव संयमी और अनुशासनप्रिय था। वे वेदों का अध्ययन करते हुए यह समझ चुके थे कि ज्ञान का भार तभी सार्थक है जब आचरण उसे थाम सके। इसलिए उन्होंने कठोर तप के साथ-साथ मर्यादा को अपना आधार बनाया। उनका आश्रम नदी-तट के समीप था—जहाँ जल की निरंतरता उन्हें कर्म की याद दिलाती और तट की स्थिरता उन्हें विवेक का पाठ पढ़ाती। वे कहते थे कि जीवन भी नदी की तरह है—बहना आवश्यक है, पर तट भी चाहिए।

जमदग्नि का विवाह रेणुका से हुआ—जो शील, सेवा और साधना की प्रतिमूर्ति थीं। रेणुका केवल गृहस्थी की धुरी नहीं थीं, वे तप की सहयात्री थीं। उनके साथ जमदग्नि का जीवन यह सिखाता है कि गृहस्थ और संन्यास विरोधी नहीं, पूरक हैं—यदि दोनों में मर्यादा हो। उनके आश्रम में अतिथि-सत्कार नियम नहीं, स्वभाव था; पर नियम टूटते नहीं थे। जमदग्नि का विश्वास था कि करुणा तभी टिकती है जब उसके साथ अनुशासन हो।

कथाएँ बताती हैं कि जमदग्नि के आश्रम में कामधेनु की एक दिव्य शाखा थी—जो आवश्यकता भर देती, विलास नहीं। यह आश्रम अनेक राजाओं और साधकों का पथ-प्रदर्शक बना। पर जहाँ मर्यादा थी, वहाँ परीक्षा भी आई। रेणुका के जीवन में एक क्षणिक विचलन का प्रसंग आता है—मानव-स्वभाव की दुर्बलता का—जिसे जमदग्नि ने धर्म की कसौटी पर रखा। उनका निर्णय कठोर प्रतीत होता है, पर उसका उद्देश्य दंड नहीं, मर्यादा की रक्षा था। कथा आगे करुणा में पूर्ण होती है—जहाँ तप, पश्चाताप और क्षमा—तीनों मिलकर संतुलन रचते हैं। यह प्रसंग सिखाता है कि धर्म का मार्ग सरल नहीं, पर उसका लक्ष्य मनुष्य को ऊँचा उठाना है।

जमदग्नि के पुत्रों में सबसे प्रसिद्ध हैं परशुराम—जिनके भीतर पिता का अनुशासन और माता की करुणा—दोनों प्रवाहित थीं। जमदग्नि ने उन्हें शस्त्र विद्या सिखाई, पर उससे पहले शास्त्र का विवेक दिया। वे कहते थे कि शस्त्र बिना विवेक के विनाश करता है, और विवेक बिना साहस के निष्फल होता है। यही शिक्षा आगे चलकर अधर्म के विरुद्ध निर्णायक बनी। जमदग्नि स्वयं हिंसा के समर्थक नहीं थे; पर अन्याय के सामने मौन को वे अपराध मानते थे। इसलिए उनका जीवन न्याय और संयम के बीच खड़ा दिखता है—न झुकता, न उग्र होता।

जमदग्नि का आश्रम शिक्षा का केंद्र था, पर वहाँ वाणी से अधिक आचरण सिखाया जाता था। शिष्य नियमों से नहीं डरते थे; वे अर्थ समझते थे। आहार सादा, विहार संयमित, अध्ययन नियमित—और सेवा अनिवार्य। जमदग्नि कहते थे कि जो अपने समय और इच्छाओं को साध ले, वही संसार की उलझनों को साध सकता है। उनके पास आने वाले राजाओं को वे पहले स्वयं पर शासन सिखाते, फिर प्रजा पर।

उनका जीवन संघर्षों से भी अछूता नहीं रहा। सत्ता का अहंकार जब मर्यादा लांघता है, तब ऋषि का धैर्य भी परीक्षा में पड़ता है। जमदग्नि के साथ ऐसा ही हुआ—और अंततः उन्होंने धर्म की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनका देहावसान हिंसा की विजय नहीं, मर्यादा की साक्षी बना—जिससे यह स्पष्ट हुआ कि धर्म की रक्षा केवल जीवित रहते नहीं, कभी-कभी बलिदान से भी होती है। उनके त्याग ने परशुराम के संकल्प को दिशा दी—पर वह दिशा भी विवेक से बँधी रही।

अंतिम क्षणों में जमदग्नि का मन शांत था। उन्होंने जीवन को नदी की तरह बहने दिया था—जहाँ आवश्यक हो वहाँ चट्टान बने, और जहाँ उचित हो वहाँ धार। शिष्यों ने अनुभव किया कि गुरु देह से परे भी मार्ग दिखा रहे हैं—क्योंकि मर्यादा का प्रकाश व्यक्तियों से नहीं, आदर्शों से फैलता है। जमदग्नि उसी प्रकाश में विलीन हो गए—जहाँ अनुशासन करुणा से मिलता है और न्याय अहंकार से मुक्त होता है।

महर्षि जमदग्नि का संदेश आज भी उतना ही कठोर और उतना ही करुण है—मर्यादा के बिना प्रेम ढुलमुल हो जाता है, और करुणा के बिना अनुशासन क्रूर। जो इन दोनों को साध ले, वही धर्म का वाहक है।

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