श्रुति और स्मृति — सनातन ज्ञान कैसे जीवित रहा
श्रुति और स्मृति — सनातन ज्ञान कैसे जीवित रहा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें सनातन की उस अद्भुत व्यवस्था का परिचय कराता हूँ जिसने ज्ञान को काग़ज़ से पहले चेतना में सुरक्षित रखा — श्रुति और स्मृति।
सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लिखने से पहले जीने पर भरोसा करता है। यही कारण है कि हमारे यहाँ ज्ञान दो धाराओं में प्रवाहित हुआ — श्रुति और स्मृति।
श्रुति का अर्थ है — जो सुना गया। यह वह ज्ञान है जिसे किसी मनुष्य ने रचा नहीं, बल्कि ऋषियों ने समाधि की अवस्था में सुना। इसी श्रेणी में आते हैं वेद और उपनिषद। इन्हें बदला नहीं गया, इनमें जोड़-घटाव नहीं हुआ, क्योंकि श्रुति को शाश्वत सत्य माना गया।
स्मृति का अर्थ है — जो स्मरण रखा गया। यह वह ज्ञान है जो समय, समाज और परिस्थिति के अनुसार समझाया गया, ढाला गया और आगे बढ़ाया गया। रामायण, महाभारत, धर्मशास्त्र और पुराण स्मृति परंपरा के उदाहरण हैं। यहाँ कथा है, संवाद है, उदाहरण हैं — ताकि सामान्य मनुष्य भी धर्म को समझ सके।
सनातन की बुद्धिमत्ता यहाँ प्रकट होती है — जहाँ श्रुति स्थिर है, वहाँ स्मृति लचीली है। जहाँ मूल सत्य अटल है, वहाँ उसकी व्याख्या समय के साथ बदल सकती है।
इसी कारण एक ही सत्य विभिन्न युगों में विभिन्न रूपों में समझाया गया। सतयुग में मौन से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में संवाद से, कलियुग में नाम से।
गुरु–शिष्य परंपरा ने श्रुति को हृदय में सुरक्षित रखा और स्मृति को समाज में जीवित। यही कारण है कि आक्रमण आए, राज्य बदले, भाषाएँ बदलीं, पर सनातन नष्ट नहीं हुआ।
क्योंकि यह किताबों में नहीं, मनुष्यों में जीवित था।
सनातन इसलिए कहता है — ज्ञान को केवल पढ़ो मत, उसे जियो। जो जिया गया, वही पीढ़ियों तक बचा।
और यही रहस्य है सनातन की अमरता का।
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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